हे प्रिये! शिष्य शुद्धात्मा से, धन की शठता से रहित यथाशक्ति पुष्पादि उपहार सामग्री लेकर गुरुदेव स्वरूप शिव को अर्पित कर उन्हें भक्तिपूर्वक मानसिक रूप से अन्तरात्मा में धीरे धीरे प्रवेश कर अष्टाङ्ग प्रणाम करे।
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