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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 36
शिष्योपायनमादाय शुद्धात्मा कुसुमादिकम् । यथाशक्ति निवेद्याथ वित्तशाम्यविवर्जितः ॥ प्रणम्य बहिरष्टाङ्गं प्रविश्यान्तः शनैः प्रिये । समप्योंपायनं भक्त्या शिवाय गुरुरूपिणे ॥
हे प्रिये! शिष्य शुद्धात्मा से, धन की शठता से रहित यथाशक्ति पुष्पादि उपहार सामग्री लेकर गुरुदेव स्वरूप शिव को अर्पित कर उन्हें भक्तिपूर्वक मानसिक रूप से अन्तरात्मा में धीरे धीरे प्रवेश कर अष्टाङ्ग प्रणाम करे।
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