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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 27
ततोऽर्चनादिकं सर्वं मन्त्रोदकपुरःसरम् । इतः पूर्वादिमनुना मन्त्री देव्यै समर्पयेत् ॥ तारत्रयमितः पूर्वं प्राणबुद्धी ततः परम् । देहधर्माधिकारतो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ॥ मनसा चेतसा वाचा कर्मणा तत्परं वदेत् । हस्ताभ्याञ्च ततः पद्धयामुदद्रेण ततः परम् ॥ शिश्ना च यत् स्मृतं पश्चाद् यदुक्तं यत् कृतं वदेत् । तत् सर्वं गुरवे चान्ते मत्समर्पितमस्त्विति । स्वाहान्तो मनुरित्युक्तस्त्रिसप्तत्यक्षरः प्रिये ॥
हे प्रिये! तब समस्त अर्चनादि को अभिमन्त्रित जल से ७३ अक्षरों वाले निम्न मन्त्र द्वारा देवी को समर्पित करे:- ॐॐॐॐॐ इतः पूर्व प्राणबुद्धिदेहधर्माधिकारतः जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु मनसा चेतसा वाचा कर्मणा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना च यत् स्मृतं यत्कृतं यदुक्तं तत् सर्वं गुरवे समर्पितमस्तु स्वाहा ॥
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