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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 37
ग्रथिताङ्गुष्ठकौ कृत्वा करौ सक्तामतर्जनी । जानुभ्यामवनिं गत्वा पञ्चाङ्गं प्रणमेद् गुरुम् ॥
घुटनों के बल पृथ्वी पर बैठकर दोनों हाथों के अँगूठों को अधित कर तर्जनी को आगे निकालकर गुरुदेव को पञ्चाङ्ग प्रणाम करे।
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