मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 55
पानञ्च त्रिविधं प्रोक्तं दिव्यवीरपशुक्रमात् । दिव्यं देव्यग्रतः पानं वीरं मुद्रासने कृतम् ॥ स्वेच्छ्या पशुवत्पीतं पशुपानमितीरितम् ॥
१. दिव्य, २. वीर, ३. पशु - इस क्रम से पान तीन प्रकार का कहा गया है। देवी के आगे पान करना 'दिव्य', मुद्रासन के साथ पान करना 'वीर' और स्वेच्छापूर्वक पशु के समान पिया गया 'पशुपान' है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें