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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 42
शोधयेति पदं दद्यात् सद्वितीयमलिं गुरुः । चुल्लुकं गुरुणा दत्तं शोधयामीति चोच्चरन् । भक्त्या चावनतः शिष्यो निःशब्दं त्रिः पिबेदलिम् ॥ पाणिभ्यां संस्पृशेद्देहं सर्वतत्त्वं समुच्चरन् । शिरः प्रभृतिपादान्तं शुद्धं देहं विचिन्तयेत् ॥
इसके बाद गुरुदेव शिष्य को द्वितीय सहित अलि (= मदिरा) देकर कहें - 'शोधय'। गुरु द्वारा प्रदत्त चुल्लू भर अलि (= मद्य) को 'सर्वतत्त्वं शोधयामि' कहते हुये शिष्य झुककर भक्तिपूर्वक तीन बार बिना कोई शब्द किये उस मद्य का पान करे और दोनों हाथों से देह को स्पर्श कर यह अनुभव करे कि शिर से पैर तक सारा शरीर शुद्ध हो गया है।
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