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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 47
प्राणभेदफलोल्लासप्रणामस्थितिलक्षणम् । अविज्ञायाचरेद् यस्तु स भवेदापदाम्पदम् ॥ निर्मन्त्रं न पिबेन्मधं प्रायश्चित्तं विधीयते । तस्मान्मन्त्रविधानेन कर्तव्यं कुलनायिके ॥
प्राणभेद के फलस्वरूप उल्लास, प्रणाम की स्थिति और लक्षण को जाने बिना जो आचरण करता है, वह आपत्ति में पड़ता है। मन्त्र के बिना आसव का पान न करे, अन्यथा प्रायश्चित्त करना पड़ता है। अतः हे कुलनायिके! निम्न मन्त्रविधान से पान करे।
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