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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 11
तारत्रयं वदेत्तारं श्रीप्रासादपरामनुः । हां ह्रीं हुश्च युगश्चादौ भैरवाधिष्ठिताय च ॥ अक्षोभ्यानन्दतः पश्चान्द्धदयाभीष्टदः परम् । सिद्धार्थपदमाभाष्य पश्चादवतरद्वयम् ॥ क्षेत्रपालपदं पश्चात् महाशान्त पदं ततः । मातृपुत्रपदं पश्चात् कुलपुत्रपदं तथा ॥ सिद्धिपुत्रपदं चास्मिन् स्थानाधिपपदं ततः । आमाधिपतयेऽस्मिन् स्याद्देशाधिपतये ततः ॥ वदेद् बटुकनाथेति देवीपुत्रपदं ततः । मेघनादपदं पश्चात् प्रचण्डोग्रपदं वंदेत् ॥ कपालीति पदं पश्चाद्भीषणेति पदं वदेत् । स्यात् सर्वविघ्नाधिपतये इमां पूजां बलिं वदेत् ॥ गृहण गृहण कुरुद्वन्द्वं मम दूरययुग्मकम् । ज्वलयुक्प्रज्वलयुगं सर्वविघ्नानीतीरयेत् ॥ नाशयद्वितयं क्षां क्षं पश्चाद् बुद्धिमितीरयेत् । क्षेत्रपालाय वौषट् हूं षष्ट्युत्तरशताक्षरः ॥
राजराजेश्वर बलि का मन्त्र - ॐ ॐ ॐ ह्सौः स्हौः ह्रां ह्रीं हूं भैरवाधिष्ठिताय अक्षोभ्यानन्द हृदयाभीष्टदः सिद्धार्थ अवतर अवतर क्षेत्रपाल महाशान्त मातृपुत्र कुलपुत्र सिद्धिपुत्र अस्मिन् स्थानाधिप ग्रामाधिपतये अस्मिन् देशाधिपतये वटुकनाथ देवीपुत्र मेघनाद प्रचण्डोग्रकपाली भीषण सर्वविघ्नाधिपतये इमां पूजां बलिं गृह्मण गृहण कुरु कुरु मम दूरय दूरय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल सर्वविघ्नान् नाशय नाशय क्षां क्षं बुद्धिं क्षेत्रपालाय वौषट् हूं। यह १६० अक्षरों का मात्र है ॥
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