हे प्रिये! श्री गुरुदेव थोड़ा सिर झुकाकर अपने बाएँ हाथ की अंगुष्ठ, अनामा अंगुलियों से शिष्य के दाएँ हाथ को फैलाकर स्पर्श करें और हे प्रिये! हे कुलेश्वरि ! शुद्ध हृदय से 'प्रकृति' आदि से 'पृथिवी' तक के २४ तत्त्वों द्वारा और वाग्भव (एँ) बीज से युक्त स्वरों द्वारा आत्मतत्त्व से शिष्य के स्थूल देह का शोधन करें।
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