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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 38
वामाऽङ्‌गुष्ठानामिकाभ्यां दक्षहस्तप्रसारितम् । स्पृष्ट्वा विशुद्धहृदय ईषदानतमस्तकः ॥ वामाङ्‌गुष्ठानामिकाभ्यां शिष्याय श्रीगुरुः प्रिये । प्रकृत्याद्यैः पृथिव्यन्तैश्चतुर्विंशतिभिः प्रिये ॥ स्वरैरशुद्धतत्त्वैश्च वाग्भवेन कुलेश्वरि । संयुक्तेनात्मतत्त्वेन स्थूलदेहं विशोधयेत् ॥
हे प्रिये! श्री गुरुदेव थोड़ा सिर झुकाकर अपने बाएँ हाथ की अंगुष्ठ, अनामा अंगुलियों से शिष्य के दाएँ हाथ को फैलाकर स्पर्श करें और हे प्रिये! हे कुलेश्वरि ! शुद्ध हृदय से 'प्रकृति' आदि से 'पृथिवी' तक के २४ तत्त्वों द्वारा और वाग्भव (एँ) बीज से युक्त स्वरों द्वारा आत्मतत्त्व से शिष्य के स्थूल देह का शोधन करें।
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