अध्याय 4 — चतुर्थोल्लासः
कुलार्णव
54 श्लोक • केवल अनुवाद
इसके बाद क से लेकर म तक व्यञ्जनों से शरीर के विभिन्न अवयवों में न्यास करना चाहिए। इन व्यञ्जनों के शक्तियों की अधिष्ठातृ देवता क्रमशः इस प्रकार हैं- आर्या, उमा, चण्डिका, दुर्गा, शिवा, अपर्णा, अम्बिका, सती, ईश्वरी, शाम्भवी, ईशानी, पार्वती, सर्वमङ्गला, दाक्षायणी, हैमवती, महामाया, महेश्वरी, मृडानी, रुद्राणी, सर्वाणी, परमेश्वरी, काली, कात्यायनी, गौरी तथा भवानी का न्यास लव, त्रुटि, कला, काष्ठा, निमेष, श्वास, घटिका, मुहूर्त, प्रहर, दिवस, सन्ध्या, रात्रि, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, पक्ष, मास, राशि, ऋतु, अयन, वत्सर, युग और प्रलय के रूप में होती है। ये कुल २५ है जिनका न्यास दक्षबाहु मूल से लेकर हृदय पर्यन्त पूर्वोक्त विधि से करना चाहिए ।
इसके बाद हे प्रिये! ब्राह्मी, वागीश्वरी, वाणी, सावित्री, सरस्वती, गायत्री, वाक्प्रदा, शारदा, भारती और विद्यात्मिका का न्यास करना चाहिए जो पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चज्ञानेन्द्रिय (पञ्चप्राण, गुणत्रय एवं करण चतुष्टय, अवस्था चतुष्टय, सप्त धातु एवं दोष त्रय) की अधिष्ठातृ देवता है। वाग्भव, भुवनेशानी, लक्ष्मी, त्रितारक - इनके बीज और सभी मूलबीजों के सहित य र ल व श ष स ह लक्ष और अ से लेकर क्ष पर्यन्त मातृकाक्षरों से न्यास करना चाहिए । वर्णों और शक्तियों के नाम के साथ 'प्रपञ्चरूपायै श्रियै नमः' आदि क्रमशः संयोजित करते हुए न्यास करे। हे प्रिये! इसे ही मातृकान्यास कहा है जिनका तत्तत्स्थानों में न्यास करे । 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' इस त्रितार एवं मूल मन्त्र के साथ सकलप्रपञ्च रूपायै पराम्बा देव्यै नमः कहकर सर्वाङ्ग में व्यापक न्यास करे।
भुवनन्यास के विधान के बाद प्रत्येक मन्त्र के आदि में पूर्ववत् 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' जोड़कर मूर्तिन्यास करे। केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर, वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध - ये १६ स्वरों के देवता कहे गए हैं। अक्षरशक्ति, आद्या, इष्टदा, ईशानी, उग्र, ऊर्द्धनयना, ऋद्धि, रूपिणी, लुप्ता, लूनदोषा, एकनायिका, ऐङ्कारिणी, औघवती, सर्वकामा, अञ्जनप्रभा और अस्थिमालाधरा - ये १६ उन स्वरों की शक्तियाँ हैं।
भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम, ईश, तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात और वामदेव - ये १२ शिव कहे गए हैं। करभद्रा, खगबला, गरिमादि, फलप्रदा, धर्मप्रशमनी, पङ्क्तिनासा, चन्द्रार्धधारिणी, छन्दोमयी, जगत्स्थाना, ज्वलत्तारा, ज्ञानफलप्रदा, टङ्कधरा और धृति - ये १२ क भ से लेकर ठ ड पर्यन्त वर्णों के देवता हैं।