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अध्याय 4 — चतुर्थोल्लासः

कुलार्णव
54 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कूुठेश! मैं श्री प्रासादपरामन्त्र को सुनना चाहती हूं। हे ईशान! उस मन्त्ररत्न मन्त्रराज को न्यास एवं ध्यान आदि के सहित बताइये।
श्री ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आपने पूछा है, उसे मैं कहूँगा। उसके सुनने मात्र से श्रोता शिवस्वरूप हो जाता है।
इसके पूर्व यह मन्त्र मैंने किसी से भी नहीं कहा है। हे प्राणवल्लभे! आपके स्नेह से आज कहता हूँ, सुनिए।
श्रीप्रासादपरामन्त्र का उद्धार - 'अनन्तचन्द्रभुवनमिन्दुबिन्दुयुगान्वितः' अर्थात् 'अनन्तचन्द्र' है नादबिन्दु (ॐ), 'भुवन' है औकार, 'बिन्दु' है हकार और 'बिन्दु युग' है सकार। इस प्रकार श्री प्रासादपरामन्त्र, 'हसौं' सिद्ध हुआ, जो भुक्ति मुक्ति रूपी फलदायक है।
प्रासादमन्त्र शब्द की व्याख्या - प्रकाशानन्दस्वरूप होने से, प्रत्यक्ष फल देने से,
प्रसन्नचित्त हो वशीभूत होने से, प्रसिद्ध अर्थ का निरूपण करने से, प्राक्तन पापों की शान्ति करने से, प्रपन्न (शरणागत) की आर्ति (दुःख) को नष्ट करने से और शीघ्र प्रसन्न करने से यह मन्त्र 'प्रासाद' कहा गया है ।
परतत्त्व का स्वरूप होने से, परमार्थ का प्रकाश करने से, परमानन्द देने से, परम-धर्म का निदर्शक होने से,
परोक्ष फल देने से, परम ऐश्वर्य का कारण होने से और सब मन्त्रों से पर (श्रेष्ठ) होने से यह मन्त्र 'परा' कहा गया है।
हे देवि! यह कुलमन्त्र है। अब इसका न्यास आपसे कहता हूँ, सुनिए। पहले प्रातःकाल उठकर गुरुदेव का ध्यान करे।
फिर एक बार मूलमन्त्र (कुलमन्त्र) का स्मरण कर शौचादि से निवृत्त हो। तब मुख शोधन, स्नान, सन्ध्या, तर्पण करे।
एकान्त में द्वारपूजा, तीनों विघ्नों का उत्सारण (निवारण) कर पूजास्थान में प्रवेश कर आसन पर बैठे।
फिर हे ईश्वरि! देवी पूजा के पूर्व ध्यान, शिवादि गुरु की वन्दना, आसन शोधन और गणपति क्षेत्रपाल की वन्दना करे।
तदनन्तर गुरुपादुकामन्त्र का स्मरण कर हे प्रिये! दिवस के नाथ (सूर्य) का अर्चन करे। फिर कराङ्ग और षडङ्गों का शोधन एवं ब्रह्मरन्ध्र में प्राणायाम,
दिग्बन्धन कर, दोनों अङ्गन्यास और दस प्रकार के मातृका न्यास (१. अन्तर्मातृका, २-४. सृष्टि स्थिति संहार - ये तीन बहिर्मातृका, ५. कला मातृका, ६. श्रीकण्ठ मातृका, ७. केशव मातृका ८. लज्जाबीज मातृका, ९. रमाबीज मातृका और १०. कामबीज मातृका) करे। तब श्री पराप्रासादमन्त्र के ऋष्यादि का न्यास करे।
श्री पराप्रासादमन्त्र का ऋष्यादिन्यास - हे पार्वति! इस मन्त्र के ऋषि परशम्भु हैं, अव्यक्तागायत्री छन्द है, सर्वमन्त्रेश्वरी परादेवता,
दीर्घ त्रय से युक्त बीज, शक्ति एवं कीलक है और षड्दीर्घ युक्त मूलबीज से षडङ्गन्यास कहा गया है। (हसां स्हां बीज है, हसी रहीं शक्ति है और हसूं स्हूं कीलक है)।
अल्पषोढान्यास - हे अम्बिके! पाँचों अंगुलियों से ईशान, तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात और आत्मा रूप मूर्ति का मुखों में न्यास करें। इसी प्रकार मूर्धा, हृदय, गुह्य और पाददेश में क्रमशः अङ्गुष्ठ सहित पाँचों अंगुलियों से अङ्गन्यास करे।
ये न्यास आधारशक्ति से आरम्भ करके पीठमन्त्र पर्यन्त करना चाहिए।
हे कुलेशानि! साधक को पूर्वोक्त क्रम से इस प्रकार अल्पषोढान्यास करना चाहिए। इसके बाद सावधान होकर देवताभाव की सिद्धि के लिए वक्ष्यमाण विधि से 'महाषोढा' नामक न्यास करे।
यह न्यास जिस किसी को न बताना चाहिए। आपके स्नेह के कारण मैं इसे आपसे कहता हूँ। १. प्रपञ्च, २. भुवन, ३. मूर्ति, ४. मन्त्र, ५. दैवत और ६. मातृका - इन ६ न्यासों से सम्बन्धित 'महाषोढान्यास' सब न्यासों में श्रेष्ठ है।
हे परमेशानि! पहले 'प्रपञ्चन्यास' बताता हूँ जो प्रपञ्च, द्वीप, जलधि, खेत,
जंगल, आश्रम, गुफाएं, नदियां, चौराहे और पेड़ हैं, इन १६ के रूप में किया जाता है।
यह न्यास श्री, माया, कमला, विष्णुवल्लभा, पद्मधारिणि, समुद्रतनया, लोकमाता, कमलवासिनी,
इन्दिरा, मा, रमा, पद्मा, नारायणप्रिया, सिद्धलक्ष्मी, राजलक्ष्मी और महालक्ष्मी - इन १६ शक्तियों के लिए किया जाता है। प्रपञ्चन्यास में ये शक्तियाँ स्वरों की अधिष्ठातृ देवता है।
इसके बाद क से लेकर म तक व्यञ्जनों से शरीर के विभिन्न अवयवों में न्यास करना चाहिए। इन व्यञ्जनों के शक्तियों की अधिष्ठातृ देवता क्रमशः इस प्रकार हैं- आर्या, उमा, चण्डिका, दुर्गा, शिवा, अपर्णा, अम्बिका, सती, ईश्वरी, शाम्भवी, ईशानी, पार्वती, सर्वमङ्गला, दाक्षायणी, हैमवती, महामाया, महेश्वरी, मृडानी, रुद्राणी, सर्वाणी, परमेश्वरी, काली, कात्यायनी, गौरी तथा भवानी का न्यास लव, त्रुटि, कला, काष्ठा, निमेष, श्वास, घटिका, मुहूर्त, प्रहर, दिवस, सन्ध्या, रात्रि, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, पक्ष, मास, राशि, ऋतु, अयन, वत्सर, युग और प्रलय के रूप में होती है। ये कुल २५ है जिनका न्यास दक्षबाहु मूल से लेकर हृदय पर्यन्त पूर्वोक्त विधि से करना चाहिए ।
इसके बाद हे प्रिये! ब्राह्मी, वागीश्वरी, वाणी, सावित्री, सरस्वती, गायत्री, वाक्प्रदा, शारदा, भारती और विद्यात्मिका का न्यास करना चाहिए जो पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चज्ञानेन्द्रिय (पञ्चप्राण, गुणत्रय एवं करण चतुष्टय, अवस्था चतुष्टय, सप्त धातु एवं दोष त्रय) की अधिष्ठातृ देवता है। वाग्भव, भुवनेशानी, लक्ष्मी, त्रितारक - इनके बीज और सभी मूलबीजों के सहित य र ल व श ष स ह लक्ष और अ से लेकर क्ष पर्यन्त मातृकाक्षरों से न्यास करना चाहिए । वर्णों और शक्तियों के नाम के साथ 'प्रपञ्चरूपायै श्रियै नमः' आदि क्रमशः संयोजित करते हुए न्यास करे। हे प्रिये! इसे ही मातृकान्यास कहा है जिनका तत्तत्स्थानों में न्यास करे । 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' इस त्रितार एवं मूल मन्त्र के साथ सकलप्रपञ्च रूपायै पराम्बा देव्यै नमः कहकर सर्वाङ्ग में व्यापक न्यास करे।
प्रपञ्चन्यास कहा गया है। अब मैं भुवनन्यास कहता हूँ। सर्वप्रथम 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' इस मूलमन्त्र को लेकर अं आं ई लगाकर 'अतललोकनिलय शतकोटि गुह्याख्य योगिनीमूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नमः' कहकर हे प्रिये! दोनों पैरों में न्यास करे।
इसके बाद मूलमन्त्र फिर ईं उं ऊं वितल और शेष पूर्ववत् रखकर हे देवि! गुल्फों में न्यास करे।
दाक्षायणी, हैमवती, महामाया, महेश्वरी, मृडानी, रुद्राणी, सर्वाणी, परमेश्वरी,
भुवनन्यास - निम्नलिखित प्रत्येक मन्त्र के आदि में 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' जोड़कर न्यास करे, यथा- ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः अं आं इं अतललोकनिलयशतकोटिगुह्याख्ययोगिनीमूलदेवतायुताधारशक्त्यम्बादेव्यै नमः पादयोः । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः ईं उं ऊं वितललोकनिलयशतकोट्यतिगुह्मयोगिनीमूलदेवतायुतानन्तशक्त्यम्बादेव्यै नमः गुल्फयोः । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः ऋ ऋ लृ सुतललोकनिलयशतकोट्यतिगुह्मयोगिनीमूलदेवतायुताचिन्त्य शक्त्यम्बादेव्यै नमः जङ्घयोः । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः तृ एं ऐं महातललोकनिलयशतकोटि महागुह्याख्ययोगिनीमूलदेवतायुन्वोः शक्त्यम्बादेव्यै नमः जान्वीः । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः ओं औं तलातललोकनिलयशतकोटि रहस्ययोगिनीमूलदेवतायुतपरमगुह्येच्छाशक्त्यम्बादेव्यै नमः ऊर्वोः । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः अं अः रसातललोकनिलयशतकोटिरहस्ययोगिनीमूलदेवतायुतज्ञानशक्त्यम्बादेव्यै नमः गुझे । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः कं (खं गं घंङ) पाताललोकनिलयशतकोटिरहस्यातिरहस्ययोगिनीमूलदेवतायुतक्रियाशक्त्यम्बादेव्यै नमः मूलाधारे । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः चं (छं जंझं जं) भूलोंक निलयशतकोट्यतिरहस्ययोगिनीमूलदेवतायुतश्रीडाकिनीशक्त्यम्बादेव्यै नमः स्वाधिष्ठाने । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः टं (ठंडं इंणं) भुवलॉकनिलयशतकोटिमहारहस्ययोगिनीमूलदेवतायुतश्रीराकिणीशक्त्यम्बादेव्यै नमः नाभौ । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः तं (थं दंधं नं) स्वलॉकनिलयशतकोटिपरमरहस्ययोगिनीमूलदेवतायुत लाकिनीशक्त्यम्बादेव्यै नमः हृदये । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः पं (फं बं भं में) महलोंकनिलयशतकोटिगुप्तयोगिनीमूलदेवतायुतश्रीकाकिनीशक्त्यम्बादेव्यै नमः तालुमूले । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः यं (रं लं वं) जनलोकनिलयशतकोटि गुप्ततरयोगिनीमूलदेवतायुतश्रीशाकिनीशक्त्यम्बादेव्यै नमः आज्ञायाम् । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः शं (षंसं हं) तपोलोकनिलयशतकोट्यतिगुप्तयोगिनीमूल- देवतायुत हाकिनीशक्त्यम्बादेव्यै नमः ललाटे । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः ळ क्ष सत्यलोकनिलयशतकोटिमहागुप्तयोगिनीमूलदेवता- युतयक्षिणीशक्त्यम्बादेव्यै नमः ब्रह्मरन्त्रे । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः अं ... ... ... क्षं चतुर्दशभुवनाधिपायै श्रीपराम्बादेव्यै नमः सर्वाङ्गे व्यापकम् ।।
भुवनन्यास के विधान के बाद प्रत्येक मन्त्र के आदि में पूर्ववत् 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' जोड़कर मूर्तिन्यास करे। केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर, वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध - ये १६ स्वरों के देवता कहे गए हैं। अक्षरशक्ति, आद्या, इष्टदा, ईशानी, उग्र, ऊर्द्धनयना, ऋद्धि, रूपिणी, लुप्ता, लूनदोषा, एकनायिका, ऐङ्कारिणी, औघवती, सर्वकामा, अञ्जनप्रभा और अस्थिमालाधरा - ये १६ उन स्वरों की शक्तियाँ हैं।
भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम, ईश, तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात और वामदेव - ये १२ शिव कहे गए हैं। करभद्रा, खगबला, गरिमादि, फलप्रदा, धर्मप्रशमनी, प‌ङ्क्तिनासा, चन्द्रार्धधारिणी, छन्दोमयी, जगत्स्थाना, ज्वलत्तारा, ज्ञानफलप्रदा, टङ्कधरा और धृति - ये १२ क भ से लेकर ठ ड पर्यन्त वर्णों के देवता हैं।
ब्रह्मा, प्रजापति, वेधा, परमेष्ठी, पितामहः, विधाता, विरिञ्जि, स्रष्टा, चतुरानन एवं हिरण्यगर्भ - ये ब्रह्मा आदि १० ब्रह्मा कहे गए है।
यक्षिणी, रञ्जिनी, लक्ष्मी, वज्रिणी, शशिधारिणी, षडाधारलया, सर्व-नायिका, हसितानना, ललिता तथा क्षमा - ये १० यादि वर्णों की देवता कही गई है।
त्रितार (ॐॐॐ), मूलमन्त्र और अन्त में स्वरों के साथ चतुर्थ्यन्त शक्तियों के सहित विष्णु आदि पद एवं नमः से युक्त मस्तक एवं मुख पर न्यास करे।
यथा- ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः अं केशवाक्षरशक्तिभ्यां नमः ललाटे । ऐं हीं श्रीं हसौ: आं नारायणद्याभ्यां नम: दक्षमुखे । ऐं हीं श्रीं हसौ: इं माधवेष्टदाभ्यां नम: दक्षस्कन्धे । ऐं हीं श्रीं हसौ: ई गोविन्देशानीभ्यां नम: दक्षकुक्ष । ऐं हीं श्रीं हसौ: उं विष्णूग्राभ्यां . नम: दक्षिणोरौ । ऐं हीं श्रीं हसौ: ऊं मधुसूदनोर्ध्वनयनाभ्यां नम: दक्षजानुनि । ऐं हीं श्रीं हसौ: श्रृं त्रिविक्रमऋद्धिभ्यां नमः दक्षजंघायाम्‌ । ऐं हीं श्रीं हसौ: ऋं वामनरूपिणीभ्यां नम: दक्षपादे । ऐं हीं श्रीं हसौः लृ श्रीधरलुपताभ्यां नमः वामपादे । ऐं हीं श्रीं हसौ: लूं हृषीकेशलूनदोषाभ्यां नम: वामजंघायाम्‌ । ऐं हीं श्रीं हसौः एं पद्मनाभैकनायिकाभ्यां नम: वामजानुनि । ऐं हीं श्रीं हसौः ऐं. दामोदरैज्ञारिणीभ्यां नमः वामोरौ । ऐं हीं श्रीं हसौ: ओ वासुदेवौघवतीभ्यां नम: वामकुक्षौ । ऐं हीं श्रीं हसौ: औं स्डर्षणसर्वकामाभ्यां नम: वामस्कंधे । ऐं हीं श्रीं हसौः अं प्रद्युम्नाझनप्रभाभ्यां नम: वाममुखे । ऐं हीं श्रीं हसौ: अ: अनिरुद्धास्थिमालाधराभ्यां नम: वाममस्तके । ऐं हीं श्रीं हसौ: कं भं भवकरभद्राभ्यां नम: दक्षपादे । ऐं हीं श्रीं हसौ: खं बं शर्वखखगबलाभ्यां नम: वामपादे । ऐं हीं श्रीं हसौ: गं फं रुद्रगरिमादिफलप्रदाभ्यां नम: दक्षपाश्वें । ऐं हीं श्रीं हसौ: घं पं पशुपतिधर्मप्रशमनीभ्यां नम: वामपाश्वें । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः ङ नं उग्रपंक्तिनासाभ्यां नम: दक्षबाहौ । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः चं धं महादेवचन्द्रार्धधारिणीष्यां नम: वामबाहौ । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः छं दं भीमछन्दोमवीभ्यां नम: कंठे । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः जं थं ईशानजगत्स्थानाभ्यां नम: ऊर्ध्वास्थे । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः झं तं तत्पुरुषज्वलत्ताराभ्यां नम: पूर्वास्ये । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः नं णं अघोरज्ञानफलअदाध्यां दक्षिणास्ये । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः टं ढं सद्योजातटझ्डधराभ्यां नम: पश्चिमास्ये । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः ठं डं वामदेवटझ्लरडामरीभ्यां नम: वामास्ये । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः यं ब्रह्मायक्षिणीभ्यां नम: मूलाघारे । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः रं प्रजापतिरंजिनीभ्यां नम: स्वाधिष्ठाने । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः लं वेधा: लक्ष्मीभ्यां नम: मणिपूरे । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः वं परमेष्ठिवज्रिणीभ्यां नम: अनाहते । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः शं पितामहशशिधारिणीभ्यां नम: विशुद्धौ । ऐं ह्रीं श्रीं हसौ: षं विधातृषडाधाराभ्यां नम: आज्ञायाम्‌ । ऐं ह्रीं श्रीं हसौ: सं विरिद्चिसर्वनायिकाभ्यां नम: इन्दौ । ऐं ह्रीं श्रीं हसौ: हं स्रष्टृटसिताननाभ्यां नम: बिन्दौ । ऐं ह्रीं श्रीं हसौ: ळं चतुराननललिताभ्यां नमः नादे । ऐं ह्रीं श्रीं हसौ: क्षं हिरण्यगर्भक्षमाभ्यां नम: नादान्ते । ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः अं ... ... ... क्षं हरिहरब्रह्माख्यत्रिमूत्र्यात्मिकायै पराम्बादेव्यै नमः सर्वाङ्गे व्यापकम् ।
पूर्ववत् निम्न मन्त्रों के आदि में 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' जोड़कर न्यास करे । अं आं इं एकल्क्षकोटिभेदप्रणवाद्येकाक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै नमः सकलफलप्रदायै एककूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः मूलाधारे । ई ठं ऊं द्विलक्षकोटिभेदहंसादिद्वयक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै नमः सकलफलप्रदायै द्विकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः लिङ्गे । हं श्रृं लूं त्रिलक्षकोटिभेदवह्रयादित्र्यक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै त्रिकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः नाभौ । लूं एं ऐं चतुर्लक्षकोटिभेदचन्द्रादिचतुरक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै चतुःकूटेश्वर्यम्बा देव्यै नमः हृदये । ओं औं अं अः पञ्चलक्षकोटिभेदसूर्यादिपञ्चाक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै पञ्चकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः कण्ठे । कं खं गं षड्‌लक्षकोटिभेदस्कन्दादिषडक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै षट्‌कूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः मुखे । घं ङ चं सप्तलक्षकोटिभेदगणेशादिसप्ताक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै सप्तकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः नेत्रयोः । छं जं झं अष्टलक्षकोटिभेदवटुकाद्यष्टाक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै अष्टकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः आज्ञायाम् । जंटं ठं नवलक्षकोटिभेदब्रह्मादिनवाक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै नव कूटेश्वर्यम्बा देव्यै नमः इन्दौ । डंढंणं दश लक्ष कोटि भेद विष्ण्वादि दशाक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधि देवतायै सकल फल प्रदायै दश कूटेश्वर्यम्बा देव्यै नमः बिन्दौ । तं थं दं एकादश लक्ष कोटि भेद रुद्राद्येकादशाक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधि देवतायै सकल फलप्रदायै एकादशकूटेश्वर्यम्बा देव्यै नमः कलायां । घं नं पं द्वादशलक्षकोटिभेदसारस्वत्यादिद्वादशाक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै द्वादशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः उन्मन्याम् । फं बं भं त्रयोदशलक्षकोटिभेदलक्ष्म्यादित्रयोदशाक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै त्रयोदशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः शिरोवृत्ते । मं यं रं चतुर्दशलक्षकोटिभेदगौर्यादिचतुर्दशाक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै चतुर्दशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः नादे । लं वं शं षं पञ्चदशलक्षकोटिभेददुर्गादिपञ्चदशाक्षरात्मिकायै नमः अखिलमन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै पञ्चदशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः नादान्ते । सं हं ळं क्षं षोडशलक्षकोटिभेदत्रिपुरादिषोडशाक्षरात्मिकायै नमः अखिल मन्त्राधिदेवतायै सकलफलप्रदायै षोडशकूटेश्वर्यम्बादेव्यै नमः ब्रह्मरन्त्रे । अं ... ... ... क्षं सर्वमन्त्रात्मिकायै पराम्बादेव्यै नमः सर्वाङ्ग व्यापकं ।
मन्त्रन्यास के अनन्तर निम्न प्रकार से (२६ स्थानों में) देवता न्यास करना चाहिए । पूर्ववत् निम्न मन्त्रों के आदि में 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' जोड़ ले- अं आं सहस्त्रकोटियोगिनीकुलसेवितायै निवृत्त्यम्बादेव्यै नमः दक्षिणपादांगुष्ठे । इं ईं सहस्रकोटियोगिनीकुलसेवितायै प्रतिष्ठाम्बादेव्यै नमः दक्षगुल्फे । ठं ऊं सहस्रकोटितपस्विकुलसेवितायै विद्याम्बादेव्यै नमः दक्षजंघायाम् । ऋत्रां सहस्त्र कोटिऋषिकुलसेवितायै शान्त्यम्बा देव्यै नमः दक्षजानुनि । लूं लूं सहस्त्रकोटिमुनिकुल सेवितायै शान्त्यतीताम्बादेव्यै नमः दक्षोरौ । एं ऐं सहस्रकोटिदेवकुलसेवितायै हल्लेखाम्बा देव्यै नमः दक्षकट्यां । ओं औं सहस्रकोटिराक्षसकुलसेवितायै गगनाम्बादेव्यै नमः दक्ष पावें । अं अंः सहस्रकोटिविद्याधरकुलसेवितायै रक्ताम्बादेव्यै नमः दक्षस्तने । कं खं सहस्रकोटिसिद्धकुलसेवितायै महोच्छुष्माम्बादेव्यै नमः दक्षकक्षे । गं घं सहस्त्रकोटि साध्यकुलसेवितायै करालाम्बादेव्यै नमः दक्षकरे । डं चं सहस्रकोटिसाप्सरकुलसेवितायै जयाम्बादेव्यै नमः दक्षस्कन्धे । छं जं सहस्रकोटिगन्धर्वकुलसेवितायै विजयाम्बादेव्यै नमः दक्षकर्णे । झं जं सहस्त्रकोटिगुह्यककुलसेवितायै अजिताम्बादेव्यै नमः दक्षशिरसि । टं ठं सहस्रकोटियक्षकुलसेवितायै अपराजिताम्बादेव्यै नमः वामशिरसि । डं ढं सहस्त्रकोटि किन्नरकुलसेवितायै वामाम्बादेव्यै नमः वामकणें । णं तं सहस्रकोटिपन्नगकुलसेवितायै ज्येष्ठाम्बादेव्यै नमः वामस्कन्धे । थं दं सहस्त्रकोटिपितृकुलसेवितायै रौद्राम्बा देव्यै नमः वामकरे । धं नं सहस्त्रकोटिगणेशकुलसेवितायै मायाम्बादेव्यै नमः वाम कक्षे । पं फं सहस्रकोटिभैरवकुलसेवितायै कुण्डलिन्यम्बादेव्यै नमः वामस्तने । बं भं सहस्र कोटिबटुककुलसेवितायै काल्यम्बादेव्यै नमः वामपावें । मं यं सहस्त्रकोटिक्षेत्रपालकुलसेवितायै कालरात्र्यम्बादेव्यै नमः वामकट्यां । रं लं सहस्त्रकोटिप्रमथकुलसेवितायै भगवत्यम्बा देव्यै नमः वामोरौ । वं शं सहस्रकोटिब्रह्मकुलसेवितायै सर्वेश्वर्यम्बादेव्यै नमः वामजानुनि । षं सं सहस्रकोटिविष्णुकुलसेवितायै सर्वज्ञाम्बादेव्यै नमः वाम जंघायाम् । हं लं सहस्रकोटिरुद्रकुलसेवितायै सर्वकर्ज्यम्बादेव्यै नमः वामगुल्फे । क्षं सहस्त्रकोटिचराचरकुलसेवितायै कुलशक्त्यम्बादेव्यै नमः वामपादांगुष्ठे । अं आं ... ... ... क्षं सर्वदेवतात्मिकायै पराशक्त्यम्बादेव्यै नमः सर्वाङ्गे व्यापकं ।
देवता न्यास कहा गया । अब छठवाँ मातृकान्यास कहते हैं । निम्नलिखित प्रत्येक मन्त्र के आदि में 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' जोड़कर न्यास करे। यथा- कं खं गं घं अनन्तकोटिभूचरीकुलसहितायै आं क्षां मङ्गलाम्बादेव्यै नमः आं क्षां ब्रह्माण्यम्बादेव्यै अनन्तकोटिभूतकुलसहितायै अं क्षं मङ्गलनाथाय अं क्षे असिताङ्गभैरवनाथाय नमः मूलाधारे । चं छं जं झं अनन्तकोटिखेचरीकुलसहितायै ई लां चर्चिकाम्बादेव्यै ई लां माहेश्वर्यम्बादेव्यै अनन्तकोटिवेतालकुलसहितायै इं लं चर्चिकनाथाय इं लं रुरुभैरव- नाथाय नमः लिङ्गे । टं ठं डं ढं अनन्तकोटिपातालखेचरीकुलसहितायै ऊं हां योगेश्वर्यम्बादेव्यै ऊं हां कौमार्यम्बादेव्यै अनन्तकोटिपिशाचकुलसहितायै ठं हं योगेशनाथाय टं हं चण्डभैरवनाथाय नमः नाभौ । तं थं दं धं अनन्तकोटिदिक्चरीकुलसहितायै श्रृं सां हरसिद्धाम्बादेव्यै श्रृं सां वैष्णव्यम्बादेव्यै अनन्तकोट्यपस्मारसहितायै ऋ सं हरसिद्धनाथाय ऋ सं क्रोधभैरव नाथाय नमः हृदये । पं फं बं भं अनन्तकोटिसहचरीकुलसहितायै लूं षां भट्टिन्यम्बा देव्यै लुं षां वाराह्यम्बादेव्यै अनन्तकोटिब्रह्मराक्षसकुलसहितायै लूं षं भट्टिनाथाय लृष उन्मत्तभैरवनाथाय नमः कण्ठे । यं रं लं वं अनन्तकोटिगिरिचरीकुलसहितायै ऐं शां किलिकिलाम्बादेव्यै ऐं शां इन्द्राण्यम्बादेव्यै अनन्तकोटिचेटककुलसहितायै एं शं किलिकिलिनाथाय एं शं कपालीभैरवनाथाय नमः आज्ञायाम् । शंष सं हं अनन्तकोटिवनचरीकुलसहितायै औं वां कालरात्र्यम्बादेव्यै औं वां चामुण्डाम्बादेव्यै अनंतकोटिप्रेतकुलसहिताय ओं वं कालरात्रिनाथाय ओं वं भीषणभैरवनाथाय नमः भाले । लं क्षं अनन्तकोटिजलचरीकुलसहितायै अः लां भीषणाम्बादेव्यै अः लां महालक्ष्म्यम्बादेव्यै अनन्तकोटिकूष्माण्डकुलसहितायै अं लं भीषणनाथाय अं लं संहारभैरवनाथाय नमः ब्रह्मरन्त्रे । अं आं ... ... ... क्षं मातृभैरवाधिपायै पराम्बादेव्यै नमः सर्वाङ्गे व्यापकम् । हे महेशानि! इस प्रकार से समाहित बुद्धि से साधक को मातृकान्यास करना चाहिए ।
हे देवि! इस प्रकार से छः न्यास से समन्वित देह द्वारा साधक अनन्य मानस होकर भगवान् शिव एवं शक्ति का अर्धनारीश्वर के रूप में ध्यान करे । अर्धनारीश्वर ध्यान - अमृतसागर के मध्य में उभरा हुआ मणिद्वीप सुशोभित है। उसमें कल्पवृक्षों के वन के अन्तर्गत नवमाणिक्यों से बना मण्डप है। उस मण्डप में नवरत्नजटित सुन्दर सिंहासन पर कमल की त्रिकोणाकार कर्णिका में चन्द्रसूर्य से शोभायमान और आधे शरीर में अम्बिका से युक्त भगवान् शिव विराजमान हैं। दोनों के विशेष आभूषण उनके शरीरों में अलग-अलग शोभित है।
करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर और सदा सोलह वर्ष की अवस्था वाले अर्द्धनारीश्वर भगवान् का मुखकमल मन्द मुस्कान से युक्त है, तीन नेत्र हैं और चूड़ा चन्द्रमा से शोभायमान है। दिव्य वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला और चन्दन धारण किए हैं। चार हाथों में पानपात्र, चिन्मुद्रा, त्रिशूल और पुस्तक लिए है। विद्याओं और सिद्धियों से युक्त वे सदा आनन्दपूर्ण हैं। महाषोढा में उल्लिखित असंख्य देवता सदैव उनकी सेवा में लगे रहते हैं। ऐसे अर्द्धनारीश्वर भगवान् शिव का ध्यान अपने हृदयकमल में करे।
हे देवि! अर्द्धनारीश्वर का ध्यान चाहे पुं रूप में करे या स्त्री रूप में अथवा सच्चिदानन्दरूप निष्कल स्वरूप का ध्यान करे, हे देवि! वह सर्वतेजोमय और चराचरात्मक विग्रह वाले हैं।
हे परमेश्वरि! फिर योनि, लिङ्ग, सुरभि, हेति, आदि चार मुद्राएं तथा वनमाला, महामुद्रा एवं नभो मुद्रा दिखाकर यथाशक्ति मूलमन्त्र का जप कर श्री पादुका मन्त्र का भी जप करे। हे देवि! इसके बाद शिवरूपी श्रीगुरु का मूर्धा में न्यास करना चाहिए।
सहस्त्रदलकमल पर विराजमान शीतल रश्मि की प्रभा से युक्त, वर एवं अभय मुद्रा धारण करने वाले, विमल गन्ध एवं पुष्प के वस्त्र से सुसज्जित, प्रसन्न वदन एवं प्रसन्न दिखने वाले और सभी देवता के साक्षात् रूप में विद्यमान तथा हंस पर सवार अमुक नाम वाले शिवरूपी गुरु का शिर में ध्यान करना चाहिए।
हे देवि! इस प्रकार षोढान्यास जो करता है, हे पार्वति! वह साक्षात् परशिव के समान होता है। वह मन्त्रज्ञ साधक निग्रह और अनुग्रह करने में समर्थ होता है, इसमें सन्देह नहीं।
जो साधक प्रतिदिन 'महाषोढा' नामक न्यास को करता है सभी देवता उसे नमस्कार करते हैं। मैं भी उसे नमस्कार करता हूँ, इसमें सन्देह नहीं।
हे पार्वति! जहाँ 'महाषोढान्यास' किया जाता है, वह स्थान और उसके चारों ओर दश योजन तक का स्थान दिव्य क्षेत्र माना जाता है।
हे देवि! इस न्यास को कर साधक जहाँ कहीं जाता है, उसे विजय, लाभ, सम्मान और गौरव प्राप्त होता है।
हे शिवे! महाषोढान्यास करने वाला जिसकी बन्दना करता है, वह छः महीने के भीतर मृत्यु को प्राप्त करता है, भले ही स्वयं शिव उसके रक्षक हों। अतः इसी का नाम 'वज्रपञ्जरन्यास' है।
इस न्यास को जो करता है, उससे दिव्य लोक, अन्तरिक्ष, भूमि, पर्वत, जल और वन में रहने वाले प्रचण्ड भूत, वेताल, देव, राक्षस, ग्रह आदि भय-भीत रहते हैं तथा हे कुलेश्वरि! उसे देखने में भी डरते हैं।
महाषोढान्यास करने वाले को ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदि देवता और ऋषि, मुनि आदि सभी नमस्कार करते हैं।
अधिक कहने से क्या लाभ, हे देवि! यह न्यास मुझे बहुत प्रिय है अतः इसे अनधिकारी शिष्य को अथवा अपने पुत्र को भी नहीं बताना चाहिए।
इस न्यास से आज्ञासिद्धि प्राप्त होती है अतः इस न्यास को करना चाहिए। हे वरानने! देवताभाव की सिद्धि के लिए इस न्यास से बढ़ कर संसार में और कोई रक्षाकवच नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ। ऊर्ध्वाम्नाय में प्रवेश, पराप्रासाद का ध्यान और महाषोढा का ज्ञान - यह थोड़ी तपस्या का फल नहीं है।
हे कुलेशानि! यह संक्षेप में मैंने कुछ महान्यासादि आपसे कहा है। अब आप और क्या सुनना चाहती है?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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