मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 41
कोटिकन्दर्पलावण्यं सदा षोडशवार्षिकम् । मन्दस्मितमुखाम्भोजं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥ दिव्याम्बरस्त्रगालेपं दिव्याभरणभूषितम् । पानपात्रञ्च चिन्मुदां त्रिशूलं पुस्तकं करैः ॥ विद्यासंसिद्धिं बिभ्राणां सदानन्दमुखेक्षणम् । महाषोढोदिताशेषदेवतागणसेवितम् एवं चित्ताम्बुजे ध्यायेदर्द्धनारीश्वरं शिवम् ॥
करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर और सदा सोलह वर्ष की अवस्था वाले अर्द्धनारीश्वर भगवान् का मुखकमल मन्द मुस्कान से युक्त है, तीन नेत्र हैं और चूड़ा चन्द्रमा से शोभायमान है। दिव्य वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला और चन्दन धारण किए हैं। चार हाथों में पानपात्र, चिन्मुद्रा, त्रिशूल और पुस्तक लिए है। विद्याओं और सिद्धियों से युक्त वे सदा आनन्दपूर्ण हैं। महाषोढा में उल्लिखित असंख्य देवता सदैव उनकी सेवा में लगे रहते हैं। ऐसे अर्द्धनारीश्वर भगवान् शिव का ध्यान अपने हृदयकमल में करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें