इसके बाद हे प्रिये! ब्राह्मी, वागीश्वरी, वाणी, सावित्री, सरस्वती, गायत्री, वाक्प्रदा, शारदा, भारती और विद्यात्मिका का न्यास करना चाहिए जो पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चज्ञानेन्द्रिय (पञ्चप्राण, गुणत्रय एवं करण चतुष्टय, अवस्था चतुष्टय, सप्त धातु एवं दोष त्रय) की अधिष्ठातृ देवता है। वाग्भव, भुवनेशानी, लक्ष्मी, त्रितारक - इनके बीज और सभी मूलबीजों के सहित य र ल व श ष स ह लक्ष और अ से लेकर क्ष पर्यन्त मातृकाक्षरों से न्यास करना चाहिए । वर्णों और शक्तियों के नाम के साथ 'प्रपञ्चरूपायै श्रियै नमः' आदि क्रमशः संयोजित करते हुए न्यास करे। हे प्रिये! इसे ही मातृकान्यास कहा है जिनका तत्तत्स्थानों में न्यास करे । 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' इस त्रितार एवं मूल मन्त्र के साथ सकलप्रपञ्च रूपायै पराम्बा देव्यै नमः कहकर सर्वाङ्ग में व्यापक न्यास करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।