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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 26
पञ्चभूतानि तन्मात्रं ज्ञानकर्मेन्द्रियाणि च । गुणान्तःकरणावस्था ध्यायेद्दोषान् दशानिलान् ॥ ब्राह्मी वागीश्वरी वाणी सावित्री च सरस्वती । गायत्री वाक्‌प्रदा पश्चात् शारदा भारती प्रिये । विद्यात्मिका पञ्च भूतव्यापकानामधीश्वराः ॥ वाग्भवं भुवनेशीञ्च लक्ष्मीबीजं त्रितारकम् । त्रितारमूलीविद्यान्त मातृकाक्षरतः परम् ॥ वदेत् प्रपञ्चरूपायै श्रियै नम इति क्रमात् । प्रपञ्चादिभिरायोज्य वर्णान शक्तीर्नियोजयेत् । मातृकान्याससंप्रोक्तस्थानेष्वेवं न्यसेत् प्रिये ॥ त्रितारमूलसकलप्रपञ्चादि स्वरूपतः । आयै पराम्बादेव्यैनथ उक्त्वा व्यापकं न्यसेत् ॥
इसके बाद हे प्रिये! ब्राह्मी, वागीश्वरी, वाणी, सावित्री, सरस्वती, गायत्री, वाक्प्रदा, शारदा, भारती और विद्यात्मिका का न्यास करना चाहिए जो पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चज्ञानेन्द्रिय (पञ्चप्राण, गुणत्रय एवं करण चतुष्टय, अवस्था चतुष्टय, सप्त धातु एवं दोष त्रय) की अधिष्ठातृ देवता है। वाग्भव, भुवनेशानी, लक्ष्मी, त्रितारक - इनके बीज और सभी मूलबीजों के सहित य र ल व श ष स ह लक्ष और अ से लेकर क्ष पर्यन्त मातृकाक्षरों से न्यास करना चाहिए । वर्णों और शक्तियों के नाम के साथ 'प्रपञ्चरूपायै श्रियै नमः' आदि क्रमशः संयोजित करते हुए न्यास करे। हे प्रिये! इसे ही मातृकान्यास कहा है जिनका तत्तत्स्थानों में न्यास करे । 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' इस त्रितार एवं मूल मन्त्र के साथ सकलप्रपञ्च रूपायै पराम्बा देव्यै नमः कहकर सर्वाङ्ग में व्यापक न्यास करे।
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