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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 43
ततः सन्दर्शयेन्मुद्रादशकं परमेश्वरि । योनि लिङ्गञ्च सुरभि हेतिमुद्राचतुष्टयम् ॥ वनमालां महामुद्रां नभोमुद्रामिति क्रमात् । यथाशक्ति मन्त्रमूलं जपेत् श्रीपादुकामपि । मूर्ध्नि सञ्चिन्तयेद्देवि श्रीगुरुं शिवरूपिणम् ॥
हे परमेश्वरि! फिर योनि, लिङ्ग, सुरभि, हेति, आदि चार मुद्राएं तथा वनमाला, महामुद्रा एवं नभो मुद्रा दिखाकर यथाशक्ति मूलमन्त्र का जप कर श्री पादुका मन्त्र का भी जप करे। हे देवि! इसके बाद शिवरूपी श्रीगुरु का मूर्धा में न्यास करना चाहिए।
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