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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 27
प्रपञ्चन्यास एव स्याद् भुवनन्यास उच्यते । त्रितारमूलमन्त्रान्ते अ आं इं अतलं वदेत् ॥ लोकञ्च निलयञ्चैव शतकोटिपदं ततः । गुह्याद्या योगिनी मूलडेयुतन्तु वदेत् प्रिये ॥ वदेदाधारशक्त्यम्बादेव्यै च पादयोन्र्यसेत् ।
प्रपञ्चन्यास कहा गया है। अब मैं भुवनन्यास कहता हूँ। सर्वप्रथम 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' इस मूलमन्त्र को लेकर अं आं ई लगाकर 'अतललोकनिलय शतकोटि गुह्याख्य योगिनीमूलदेवतायुताधार शक्त्यम्बादेव्यै नमः' कहकर हे प्रिये! दोनों पैरों में न्यास करे।
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