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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 25
लवस्त्रुटिः कला काष्ठा निमेषः श्वास एव हि । घटिका च मुहूर्त्तश्च प्रहरो दिवसस्तथा ॥ सन्ध्या रात्रिस्तिथिश्चैव वारो नक्षत्रमेव च। योगश्च करणं पक्षौ मासो राशिऋतुस्तथा ॥ अयनं वत्सरयुगप्रलयाः पञ्चविंशतिः । एतेषां स्थाननियमो हृदयान्तः समीरितः ॥ आर्योमा चण्डिका दुर्गा शिवाऽपर्णाऽम्बिका सती । ईश्वरी शाम्भवीशानी पार्वती सर्वमङ्गला ॥ दाक्षायणी हैमवती महामाया महेश्वरी । मृडानी चैव रुद्राणी सर्वाणी परमेश्वरी ॥ काली कात्यायनी गौरी भवानीति समीरिता। शक्तयः स्युर्लवादीनां स्पर्शानामधिदेवताः । एतासां स्थाननियमो हृदयान्तः समीरितः ॥
इसके बाद क से लेकर म तक व्यञ्जनों से शरीर के विभिन्न अवयवों में न्यास करना चाहिए। इन व्यञ्जनों के शक्तियों की अधिष्ठातृ देवता क्रमशः इस प्रकार हैं- आर्या, उमा, चण्डिका, दुर्गा, शिवा, अपर्णा, अम्बिका, सती, ईश्वरी, शाम्भवी, ईशानी, पार्वती, सर्वमङ्गला, दाक्षायणी, हैमवती, महामाया, महेश्वरी, मृडानी, रुद्राणी, सर्वाणी, परमेश्वरी, काली, कात्यायनी, गौरी तथा भवानी का न्यास लव, त्रुटि, कला, काष्ठा, निमेष, श्वास, घटिका, मुहूर्त, प्रहर, दिवस, सन्ध्या, रात्रि, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, पक्ष, मास, राशि, ऋतु, अयन, वत्सर, युग और प्रलय के रूप में होती है। ये कुल २५ है जिनका न्यास दक्षबाहु मूल से लेकर हृदय पर्यन्त पूर्वोक्त विधि से करना चाहिए ।
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