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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 31
कृत्वैवं भुवनन्यासं मूर्त्तिन्यासमथाचरेत् । केशवनारायणमाधवगोविन्दविष्णवः ॥ मधुसूदनसंज्ञश्च स्यात्त्रिविक्रमवामनौ । श्रीधरश्च हृषीकेशः पद्मनाभो दामोदरः । वासुदेवः सङ्कर्षणः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः ॥ अक्षोरोष्टदा चेशानी चोग्रोवनयना तथा । ऋद्धिश्च रूपिणी लुप्ता लूनदोषैकनायिका ॥ ऐकारिणी चौधवती सर्वकामाञ्जनप्रभा । अस्थि मालाघरा चेति सम्प्रोक्ताः स्वरदेवताः ॥
भुवनन्यास के विधान के बाद प्रत्येक मन्त्र के आदि में पूर्ववत् 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' जोड़कर मूर्तिन्यास करे। केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर, वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध - ये १६ स्वरों के देवता कहे गए हैं। अक्षरशक्ति, आद्या, इष्टदा, ईशानी, उग्र, ऊर्द्धनयना, ऋद्धि, रूपिणी, लुप्ता, लूनदोषा, एकनायिका, ऐङ्कारिणी, औघवती, सर्वकामा, अञ्जनप्रभा और अस्थिमालाधरा - ये १६ उन स्वरों की शक्तियाँ हैं।
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