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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 20
यस्य कस्यापि नैवोक्तं तव स्नेहाद्वदाम्यहम् । प्रपञ्श्ञ्चो भुवनं मूर्तिर्मन्त्रदेवतमातरः । महाषोढाह्वयो न्यासः सर्वन्यासोत्तमोत्तमः ॥
यह न्यास जिस किसी को न बताना चाहिए। आपके स्नेह के कारण मैं इसे आपसे कहता हूँ। १. प्रपञ्च, २. भुवन, ३. मूर्ति, ४. मन्त्र, ५. दैवत और ६. मातृका - इन ६ न्यासों से सम्बन्धित 'महाषोढान्यास' सब न्यासों में श्रेष्ठ है।
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