दिग्बन्धन कर, दोनों अङ्गन्यास और दस प्रकार के मातृका न्यास (१. अन्तर्मातृका, २-४. सृष्टि स्थिति संहार - ये तीन बहिर्मातृका, ५. कला मातृका, ६. श्रीकण्ठ मातृका, ७. केशव मातृका ८. लज्जाबीज मातृका, ९. रमाबीज मातृका और १०. कामबीज मातृका) करे। तब श्री पराप्रासादमन्त्र के ऋष्यादि का न्यास करे।
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