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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 3
इतः पूर्व मया नोक्तो मन्त्रोऽयं यस्य कस्यचित् । तव स्नेहाद्वदाम्यद्य शृणु मत्प्राणवल्लभे ॥
इसके पूर्व यह मन्त्र मैंने किसी से भी नहीं कहा है। हे प्राणवल्लभे! आपके स्नेह से आज कहता हूँ, सुनिए।
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