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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 44
सहस्रदलपङ्कजे सकलशीतरश्मिप्रभम् वराभयकराम्बुजं विमलगन्धपुष्पाम्बरम् । प्रसन्नवदनेक्षणं सकलदेवतारूपिणम् स्मरेत् शिरसि हंसगं तदभिधानपूर्वं गुरुम् ॥
सहस्त्रदलकमल पर विराजमान शीतल रश्मि की प्रभा से युक्त, वर एवं अभय मुद्रा धारण करने वाले, विमल गन्ध एवं पुष्प के वस्त्र से सुसज्जित, प्रसन्न वदन एवं प्रसन्न दिखने वाले और सभी देवता के साक्षात् रूप में विद्यमान तथा हंस पर सवार अमुक नाम वाले शिवरूपी गुरु का शिर में ध्यान करना चाहिए।
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