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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 40
एवं न्यस्ततनुदैवि ध्यायेद्देवमनन्यधीः । अमृतार्णवमध्योद्यन्मणिद्वीपे सुशोभिते ॥ कल्पवृक्षवनान्तः स्थमणि माणिक्यमण्डपे । नवरत्नमय श्रीमत्सिंहासनगतेम्बुजे त्रिकोणान्तः समासीनं चन्द्रसूर्यायुतप्रभम् । अर्जाम्बिकासमायुक्तं प्रविभक्तविभूषणम् ॥
हे देवि! इस प्रकार से छः न्यास से समन्वित देह द्वारा साधक अनन्य मानस होकर भगवान् शिव एवं शक्ति का अर्धनारीश्वर के रूप में ध्यान करे । अर्धनारीश्वर ध्यान - अमृतसागर के मध्य में उभरा हुआ मणिद्वीप सुशोभित है। उसमें कल्पवृक्षों के वन के अन्तर्गत नवमाणिक्यों से बना मण्डप है। उस मण्डप में नवरत्नजटित सुन्दर सिंहासन पर कमल की त्रिकोणाकार कर्णिका में चन्द्रसूर्य से शोभायमान और आधे शरीर में अम्बिका से युक्त भगवान् शिव विराजमान हैं। दोनों के विशेष आभूषण उनके शरीरों में अलग-अलग शोभित है।
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