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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 6
प्रसन्नचित्तवश्यत्वात् प्रसिद्धार्थनिरूपणात् । प्राक्तनाघप्रशमनात् प्रपन्नात्र्त्तिविनाशनात् । प्रसादकरणाच्छीघ्रं प्रासादमनुरीरितः ॥
प्रसन्नचित्त हो वशीभूत होने से, प्रसिद्ध अर्थ का निरूपण करने से, प्राक्तन पापों की शान्ति करने से, प्रपन्न (शरणागत) की आर्ति (दुःख) को नष्ट करने से और शीघ्र प्रसन्न करने से यह मन्त्र 'प्रासाद' कहा गया है ।
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