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कुलार्णव • अध्याय 4 • श्लोक 48
कृत्वा न्यासमिमं देवि यत्र गच्छति मानवः । तत्र स्याद्विजयो लाभः सम्मानः पौरुषं प्रिये ॥
हे देवि! इस न्यास को कर साधक जहाँ कहीं जाता है, उसे विजय, लाभ, सम्मान और गौरव प्राप्त होता है।
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