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अध्याय 7 — सप्तमी अंक

अभिज्ञानशाकुन्तलम्
36 श्लोक • केवल अनुवाद
(तत्पश्चात्‌ आकाशमार्ग से रथ पर बैठे हुये राजा और मातलि प्रवेश करते हैं) राजा:-- हे मातलि, (इन्द्र के दुर्जय दैत्यों के वध रूप) आदेश का परिपालन कर देने पर भी इन्द्र के द्वारा किये गये विशेष सत्कार के कारण मैं अपने को (उस प्रकार के) सत्कार के लिये अयोग्य-सा समझ रहा हूँ। मातलि:-- (मुस्कराकर) चिरंजीवी, मैं (इन्द्र और आप राजा दुष्यन्त) दोनों को ही असन्तुष्ट समझ रहा हूँ । आप इन्द्र के द्वारा किये गये सत्कार से (इन्द्र के प्रति अपने द्वारा) पहले किये गये उपकार को छोटा (तुच्छ) मानते (समझते) हैं । वह (इन्द्र) भी आप के पराक्रम (विशिष्ट वीरता) से आश्वर्यचकित होकर (आप के प्रति अपने द्वारा दिये गये) सत्कार के महत्त्व को (कुछ भी) नहीं गिनते (समझते) हैं ।
राजा:-- हे मातलि, नही, ऐसा न (कहो) । विदायी के अवसर पर (इन्द्र के द्वारा) किया गया वह सत्कार तो निश्चय ही मेरे कल्पनाओं का भी विषय नहीं है (अर्थात्‌ कल्पनाओं से भी परे की वस्तु है) । क्योंकि देवताओं के सामने (अपने) आधे आसन पर बैठाकर मुझको समीप में खड़े हुये भीतर ही भीतर (मन ही मन)(माला पहनने) के इच्छुक (अपने पुत्र) जयन्त को देखकर मुस्कराते हुये इद्र ने (अपने) वक्षःस्थल पर लगे हुये हरिचन्दन से चिह्नित मन्दार-पुष्यों की माला (मुझे) पहना दी ।
मातलि:-- चिरञ्जीवी, आप कौन सी वस्तु देवेन्द्र से नहीं प्राप्त कर सकते ? देखिये इस समय (अर्थात्‌ वर्तमान काल में) झुकी हुई गांठो वाले आप के बाणों और प्राचीन काल मे उंगलियों के जोड़ पर मुड़े हुए नरसिंह (भगवान्‌) के नाखूनों के द्वारा, (इस प्रकार) इन (बाणों और नाखुनों) दोनों के द्वारा सुखोपभोगासक्त इन्द्र के स्वर्ग को दावनवरूपी काँटों से रहित कर दिया गया ।
राजा:-- यह (इस विषय में) तो इन्द्र की महत्ता प्रशंसनीय है । महान्‌ (बड़े-बड़े) भी कार्यो में नियुक्त किये गये (सेवक) जो सफल हो जाते हैं, उसे स्वामियों के गौरव का गुण (ही) समझना चाहिये । क्या (सूर्य का सारथि) अरुण अन्धकार का विनाशक हो पाता (अर्थात्‌ नहीं हो पाता) यदि सूर्य उस (अरुण) को (अपने रथ के) धुरा में (अग्रभाग में) न किये होते ।
मातलि:-- यह (कथन आप के) अनुरूप ही है । (कुछ दूर आगे जाकर) चिरञ्जीविन्‌ , स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठित अपने यश के सौभाग्य को इधर देखिये । (आयुष्मान्‌) ये (स्वर्ग-निवासी) देवता गेय अर्थसमूह (भावों) को सोचकर (गेयपद्यों को बनाकर) देवाङ्गनाओं के अङ्गराग (प्रसाधन) से अवशिष्ट रङ्गो से कल्पलता (कल्पवृक्ष) के रेशमी वस्त्रों पर आप के चरित को लिख रहे हैं ।
राजा:-- हे मातलि, असुरों पर आक्रमण करने के लिये उत्कण्ठित मैने पहले दिन स्वर्ग की ओर चढ़ते समय, स्वर्ग का मार्ग (ध्यानपूर्वक) नहीं देखा था । (बताइये) हम लोग वायु के किस मार्ग पर चल रहे हैं ? मातलिः-- जो (परिवह नामक वायु) आकाश में प्रतिष्ठित (स्थित) आकाश गंगा को धारण करता है और (जो वायु रूप) किरणों को फैलाकर ग्रह-नक्षत्रों (सप्तर्षि-मण्डल) को (ठीक ठीक) चलाता (घुमाता) है । (वामन रूप धारण करने वाले) विष्णु के द्वितीय चरण-विन्यास से अन्धकार-रहित (पवित्र) इसे "परिवह" नामक वायु का मार्ग कहते हैं ।
राजा:-- हे मातलि, इसीलिये (नेत्रादि) बाहरी और (मन आदि) भीतरी इन्द्रियों के सहित मेरी अन्तरात्मा प्रसन्न हो रही है (रथ के पहिये को देखकर) हम दोनों बादलों के मार्ग से उतर रहे हैं । मातलि:-- कैसे मालूम हो रहा है ? राजा:-- जिसके चक्र का प्रान्तभाग (परिधि) जल-कणों से भीगे प्रान्त भाग वाला गीला हो गया है - ऐसा यह आपका रथ (अपने) अरों (तिलियों) के छिद्रों से निकल कर जाते हुये चातकों के द्वारा तथा बिजली के तेज से अनुलिप्त (रञ्जित) घोड़ो के द्वारा, जल से परिपूर्ण बादलों के ऊपर चलने को सूचित कर रहा है ।
मातलि:-- क्षरभर मे चिरञ्जीवी (आप) अपने अधिकार वाली भूमि पर रहेंगे (अर्थात्‌ अपने राज्य में पहुंच जाएंगे)। राजा:-- ( नीचे देखकर) वेग से उतरने के कारण मनुष्य-लोक आश्चर्यजनक दृश्य वाला दिखायी पड़ रहा है । क्योकि पृथ्वी ऊपर की ओर उठते हुये (उभरते हुये) पर्वतों के शिखर से मानो नीचे उतर रही है । वृक्ष तनों के प्रकट होने (दिखायी पड़ने) के कारण (मानो) पत्तों के भीतर छिपना छोड़ रहे हैं । कृशता (क्षीणता) के कारण जलविहीन सी दिखायी पड़ने वाली नदियाँ विस्तार के कारण (मानो) प्रकट हो रही हैं । देखिये, ऐसा मालूम पड़ता है कि भूमण्डल मानो किसी के द्वारा उछालकर मेरे पास लाया जा रहा है ।
मातलि:-- (आप ने) ठीक देखा । (अत्यधिक आदरपूर्वक देखकर) अहो, यह पृथ्वी (कितनी) विशाल और रमणीय (चित्ताकर्षक) है । राजा:-- मातलि, यह पूर्व और पश्चिम समुद्र में प्रविष्ट, सुवर्ण के रस को बहाने वाला सायंकालीन बादलों की अर्गला (परिधि) के समान यह कौन पर्वत दिखायी पड़ रहा है ? मातलि:-- चिरञ्जीविन्‌ , यह तपस्या का सिद्धि-क्षेत्र किन्नरों का हेमकूट नामक पर्वत है । देखिये ब्रह्मा के पुत्र मरीचि से जो प्रजापति (कश्यप) उत्पन्न हुये हैं, देवताओं और राक्षसों के पिता वे (प्रजापति) (अपनी) पत्नी के साथ यहाँ तपस्या कर रहे हैं ।
राजा:-- तो कल्याण करने वाली वस्तुएँ अनुलंघनिय होती हैं । मैं भगवान्‌ (कश्यप) की प्रदक्षिणा करके ही (यहाँ से) जाना चाहता हूँ । मातलि:-- यह विचार ठीक है । (अभिनयपूर्वक दोनों उतर गये)। राजा:-- (अश्चर्यपूर्वक) पृथ्वी का स्पर्श न होने के कारण रथ के पहियों की नेमियों (प्रान्तभागों) ने शब्द नहीं किया है और (कहीं) धूल भी उठती (उड़ती) हुई नहीं दिखायी पड़ रही है । (झटका उद्घात) न लगने के कारण (ऊपर-नीचे न होने के कारण) तुम्हारा (आपका) रथ (पृथ्वी पर) उतरा हआ भी (उतर गया है ऐसा) प्रतीत नहीं हो रहा है ।
मातलि:-- इतनी ही इन्द्र (के रथ) की आप (के रथ) से विशेषता (अन्तर) है । राजा:-- हे मातलि, मरीचि के पुत्र (कश्यप, मारीचि) का आश्रम किस प्रदेश में (स्थान पर) है ? मातलि:-- (हाथ से दिखाता हुआ) बिमोट-बांबी से आच्छादित (ढके हुये) आधे शरीर वाले, लिपटी हुयी साँप की केंचुल वाली छाती से युक्त, पुरानी लताओं के तन्तुओं के समूह (के लिपट जाने) के कारण गले में अत्यधिक पीड़ित और कंधों तक फैले हुये तथा पक्षियों के घोंसले से व्याप्त (परिपूर्ण) जटाओं के समूह को धारण करते हुये ठूंठ की भाँति निश्चल ये मुनि जहां पर सूर्य-मण्डल की ओर (मुख कर) स्थित है । (वही कश्यप ऋषि का आश्रम है) ।
राजा:-- कठोर तपस्या करने वाले (मुनि) को (मेरा) प्रणाम है । मातलि:-- (रथ के घोड़ों की लगाम खींचकर) अदिति के द्वारा (जल सेचनादि द्वारा) परिवर्धित मन्दार वृक्ष वाले, प्रजापति (कश्यप) के आश्रम में हम लोग प्रविष्ट हो गये हैं । राजा:-- स्वर्ग से भी अधिक शान्तिप्रद (सुखप्रद) स्थान है । (इस स्थान में आकर) मानो मैं अमृत के सरोवर मे डुबकी लगा रहा हूँ । मातलि:-- (रथ को रोककर) चिरञ्जीवी (आप) उतरें । राजा:-- (उतरकर) हे मातलि, अब आप क्या (करेंगे) ? मातलि:-- मेरे द्वारा रथ अच्छी प्रकार रोक दिया गया है । हम लोग भी (अब) उतरते हैं । (वेसा कर अर्थात्‌ उतरकर) चिरञ्जीविन्‌ , इधर से (आईये) । (घूमकर) ऋषियों के तपोवन के स्थानों को (आप) देखें । राजा:-- वस्तुतः मैं (स्थानों को) आश्चर्य से देख रहा हूँ । कल्पवृक्षों वाले (इस) वन में (ये मुनि) वायु भक्षण के द्वारा (अपना) जीवन-यापन करने के अभ्यस्त हैं, स्वर्ण-कमलों के पराग से पीले जल में धार्मिक स्नान-कार्य करते हैं, रत्नों के शिलाखण्डों पर (बैठकर) ध्यान लगाते हैं तथा देवाङ्गनाओं के समीप में रहकर संयम (इन्दरिय-निग्रह) करते हैं । दूसरे मुनि (अपनी) तपस्याओं के द्वारा जिन (वस्तुओं) को चाहते हैं, उन्हीं (वस्तुओं के बीच) में ये रहकर (मुनि) तपस्या करते हैं ।
मातलि:-- बड़े लोगों (महात्माओं) की अभिलाषा सदा उधर्वगामिनी होती है । (घूमकर । आकाश में) हे वृद्ध शाकल्य, भगवान्‌ मारीच (कश्यप) क्या कर रहे हैं ? क्या कह रहे हैं आप ? कि दाक्षायणी (अदिति) के द्वारा पूछे गये पतिव्रता धर्म के विषय में वे (अन्य) महर्षियों की पत्नियों के साथ उस (दाक्षायणी) को उपदेश दे रहे हैं। राजा:-- (कान लगाकर) अरे, (पतिव्रता धर्म का) प्रसंग (प्रस्ताव) ऐसा है कि हमें (उसकी समाप्ति के) अवसर की प्रतीक्षा करनी चाहिये । मातलि:-- (राजा को देखकर) तब तक चिरञ्जीवी (आप) इस अशोक वृक्ष के नीचे बैठें जब तक मैं इंद्र के पिता (मारीच) से (आप के आगमन की सूचना देने के लिये) उचित अवसर खोजता हूँ । राजा:-- जैसा आप (ठीक) समझें । (बैठता है) । मातलि:-- चिरञ्जीवी, मैं जा रहा हूँ । (निकल जाता है) । राजा:-- (शकुन को सूचित करके) मैं (शकुन्तला रूप) अभीष्ट वस्तु (की प्राप्ति) की आशा नहीं करता हूँ । हे (मेरी दाहिनी) भुजा, तुम व्यर्थ (ही) क्यों फड़क रही हो । क्योंकि पहले तिरस्कृत किया गया कल्याण दुख के रूप में बदल जाता है अर्थात्‌ तिरस्कृत कल्याण की परिणति दुख में ही होती है । वस्तुतः वह वापस नहीं आता ।
(नेपथ्ये में) चंचलता मत करो । क्यों अपने (क्षत्रिय) स्वभाव को ही प्राप्त हो गया है ? राजा:-- (कान लगाकर) यह धृष्टता (उदण्डता) का स्थान नहीं है तो फिर यह कौन रोका जा रहा है ? (आवाज की ओर देखकर अश्चर्यपूर्वक) अरे, दो तपस्विनियों द्वारा अनुगमन किया जाता हुआ (असाधारण शक्तिशाली) युवा के समान बलशाली यह बालक कौन है ? जिसने माता के स्तनों के दूध को आधा ही पिया है तथा रगडने से (खींचने से) जिसके बाल (केसर) बिगड़ (बिखर) गये हैं ऐसे सिंहशावक (सिंह के बच्चे) को खेलने के लिये बलपूर्वक (हठपूर्वक) खींच रहा है (यह बालक कौन है ?)
(तत्पश्चात्‌ पूर्वोक्त कार्य करता हुआ दो तपस्विनियों के साथ बालक प्रवेश करता है) बालक:-- हे सिंह, तुम जंभाई लो (अथवा मुंह खोलो), मैं तुम्हारे दँतों को गिनूँगा । पहली:-- हे अशिष्ट, हमारे सन्तान के समान (इन) प्राणियों को क्यो उत्पीडित (परेशान) कर रहे हो । ओह, तुम्हारा क्रोध बढता ही जा रहा है । ऋषियों के द्वारा तुम ठीक ही रखे गये "सर्वदमन" नाम वाले हो । (अर्थात्‌ ऋषियों ने ठीक ही तुम्हारा “सर्वदमन" यह नाम रखा है) । राजा:-- न जाने क्यों इस बालक पर मेरा मन औरस पुत्र (सगे बेटे) की भाँति स्नेह कर रहा है ? निश्चित ही सन्तानहीनता मुझे (इस भाँति) स्नेह करा रही है । दूसरी:-- यह सिंहनी तुम पर अवश्य आक्रमण करेगी यदि तुम इसके बच्चे को नहीं छोड़ते हो । बालक:-- (मुस्कराकर) ओह, मैं अत्यधिक डर गया हूँ । (अपना निचला ओंठ दिखाता है) । राजा:-- महान्‌ तेज का बीजस्वरूप यह बालक, चिनगारी की अवस्था में विद्यमान और इन्धन की अपेक्षा करते हुये अग्नि की भाँति मुझको प्रतीत हो रहा है ।
पहली:-- बेटा, इस सिंह के वच्चे को छोड़ दो मैं तुमको दूसरा खिलोना दूंगी । बालक:-- कहाँ है ? (खिलौना मुझको) दो । (हाथ फैलाता है) । राजा:-- (बालक के हाथ को देखकर) क्या यह चक्रवर्ती के लक्षणों को धारण कर रहा है ? क्योकि इसका लुभावनी वस्तु (खिलौने) के लिये प्रेम (अथवा अभिलाषा) के कारण फैलाया गया और जाल के समान गुंथी हयी उंगलियों वाला इस (बालक) का हाथ, ऐसा सुशोभित हो रहा है, जैसे बड़ी हुई लालिमा से युक्त नवीन उषा के द्वारा विकसित किये गये और अदृष्टि गोचर पह्लुडियों के मध्यभाग से युक्त (अर्थात्‌ जिसकी पह्लुडियों का मध्यभाग नहीं दिखायी पड़ रहा है ऐसा) अद्वितीय कमल हो ।
दूसरी:-- हे सुव्रता, कहने मात्र से यह नहीं रोका जा सकता । तुम जाओ मेरी कुटिया में रंगों से रगा हुआ ऋषिकुमार मार्कण्डेय का मिट्टी का मोर रखा हुआ है । उसे इसके लिए लाओ । पहली:-- (जैसा तुम कहती हो) वैसा (ही करती हूँ) । (निकल जाती है) । बालक:-- तब तक इसी से खेलता हूँ । (तापसी को देखकर हँसता है) । राजा:-- वस्तुतः इस हठी (नटखट) बालक (को प्यार करने) के लिये मैं ललक रहा हूँ । अकारण (अर्थात्‌ बिना किसी कारण के) हंसी से जिनका दाँतरूपी अंकुर कुछ-कुछ दिखायी पड़ रहा है, अस्पष्ट वर्णो के (उच्चारण के) कारण (अर्थात्‌ तोतली बोली से) जिनका बोलना रमणीय (प्रिय) लग रहा है, जो गोद में रहने (चढ़ने) के लिये लालायित रहते हैं, ऐसे पुत्रों को (गोद में) लिये हुये भाग्यशाली लोग (ही) उन (बच्चों) के (शरीर के) अंगों (में लगी हुई) धूल से मलिन (धूसरित) होते हैं ।
तपस्विनी:-- अच्छा, यह मुझे (कुछ) नहीं गिन रहा (समझ रहा) है । (अगल बगल देखकर) यहाँ ऋषि-कुमारों में कौन (उपस्थित) है ? (राजा को देखकर) हे महाशय, यहाँ आइये । जिसके हाथ की पकड़ (हस्तग्रहण) छुड़ाना बड़ा कठिन (दुर्मोन्च) है ऐसे बालक के द्वारा बालक्रीड़ा के साथ पीड़ित (परेशान) किये जाते हुये इस सिंहशावक को छुड़ा दीजिये । राजा:-- (समीप जाकर मुस्कराते हुये) अरे महर्षिपुत्र, इस प्रकार आश्रम के विपरीत (विरुद्ध) आचरण (व्यवहार) करने वाले तुम, जन्म से ही प्राणियों (जीवो) को आश्रय देने के कारण सुखप्रद भी (अहिंसा आदि) संयम, काले साँप के बच्चे के द्वारा चन्दन के वृक्ष की भाँति क्यों दूषित (कलंकित) कर रहे हो ?
तपस्विनी:-- महाशय, यह ऋषि पुत्र नहीं है । राजा:-- आकृति के अनुरूप (सदृश) इसका व्यवहार ही बतला रहा है (कि यह ऋषि पुत्र नहीं) । परन्तु (इस) स्थान के विश्वास के कारण हमने सोचा था । (तपस्विनी की प्रार्थना के अनुसार कार्य करते हुये अर्थात्‌ बालक से सिंह-शावक को छुड़ाते हुये बालक के स्पर्श को प्राप्तकर । (अपने मन में) किसी भी वंश के अङ्करस्वरूप इस (बालक) के द्वारा स्पर्श किये गये मेरे अंगों को (यदि) ऐसा सुख (हो रहा है) (तो) जिस भाग्यशाली की गोद से यह उत्पन्न हुआ है, उसके हृदय मे कितना सुख (आनन्द) उत्पन्न करता होगा (देता होगा) । अर्थात्‌ उसके आनन्द की तो सीमा ही नहीं होगी ।
तपस्विनी:-- (दोनों को देखकर) आश्चर्य है, आश्चर्य है । राजा:-- आर्ये, (आश्चर्य) क्यों ? तपस्विनी:-- इस बालक की और आप की मिलती हुई आकृति है अर्थात्‌ दोनों की आकृति परस्पर मिल रही है । इसलिये मैं आश्चर्यचकित हूँ । अपरिचित होते हुये भी (यह) आप के अनुकूल हो गया है (अर्थात्‌ अपरिचित होते हुये भी आप के कहने से यह शान्त हो गया है) । राजा:-- (बालक को दुलारते हुये) यदि यह मुनि-कुमार नहीं है, तो इसका वंश (व्यपदेश) क्या है ? राजा:-- (अपने मन में) क्या मेरे समान वंश वाला (एकान्वय) है (अर्थात्‌ क्या मेरा और इसका वंश एक ही है) ? इसलिये आदरणीय (आप) (तपस्विनी) इस (बालक को) मेरे समान (अनुरूप) मान रही हैं । यह पुरुवंशियों का अन्तिम कुलव्रत भी है । जो पहले (युवावस्था में) पृथ्वी की रक्षा के लिये भोगों से परिपूर्ण भवनों में निवास चाहते हैं (निवास करते हैं), बाद में (अर्थात्‌ वृद्धावस्था में) जहां तपस्विजन नियमित रूप से जीवन व्यतीत करते हैं ऐसी वृक्षों की जड़ें उनका घर हो जाती हैं ।
(प्रकट रूप में) यह (स्थान) मनुष्यों की अपनी स्वाभाविक गति का विषय नहीं है (अर्थात्‌ मनुष्य अपनी स्वाभाविक शक्ति से इस स्थान तक नहीं पहुँच सकता है) । तपस्विनी:-- जैसा महाशय (आप) कहते हैं (वह ठीक है) । अप्सरा (मेनका) से सम्बन्ध होने के कारण इस (बालक) की माँ ने देवताओं के पिता (कश्यप) के आश्रम में (इसको) जन्म दिया है । राजा:-- (एक ओर मुख कर) ओह, यह दूसरी आशाजनक (बात) है । (प्रकट रूप में) अच्छा, आदरणीय (इस बालक की माता) किस राजर्षि की पत्नी हैं ? तपस्विनी:-- (अपनी) धर्मपत्नी का परित्याग करने वाले उस (व्यक्ति) का नाम लेने को कौन सोचेगा (अर्थात्‌ उसका नाम कौन लेगा) ? राजा:-- (अपने मन में) वस्तुतः यह कथा तो मुझे ही लक्ष्य बना रही है । तो इस बालक की माता का नाम पूछता हूँ । अथवा दूसरे की स्त्री के प्रति (यह) व्यवहार (पृपुछताछ) अनुचित है । (मिट्टी का मोर हाथ में ली हुई प्रवेश कर) तपस्विनी:-- सर्वदमन, पक्षी (शकुन्त) का सौंदर्य देखो । बालक:-- (इधर-उधर दृष्टि डालता हुआ) कहाँ है मेरी माँ ? दोनों:-- नाम की समानता के कारण मातृभक्त (यह बालक) ठगा गया (अर्थात्‌ धोखे में आ गया) । दूसरी:-- बेटा इस मिट्टी के मोर की रमणीयता को देखो, (मेरे द्वारा) तुम कहे गये हो (अर्थात्‌ मैने तुमसे यह कहा कि इस मिट्टी के मोर का सौंदर्य देखो) । राजा:-- (अपने मन में) क्या शकुन्तला इसकी माता का नाम है ? किन्तु नामों में समानता भी होती है । ठेसा न हो कि मृगतृष्णा की भांति (शकुन्तला) के नाम का प्रसङ्ग मेरे दुःख के लिये कारण हो जाए । बालक:-- माँ यह सुन्दर मोर मुझे अच्छा लग रहा है । (खिलौना ले लेता है) । पहली:-- (देखकर, घबराहट के साथ) हाय, रक्षाकरण्डक रक्षासूत्र यन्त्र इसकी कलाई में नहीं दिखलायी पड़ रहा है । राजा:-- डरें नहीं । इसका यह रक्षाकरण्डक (रक्षासूत्र, रक्षायन्त्र) सिंह के बच्चे की रगड़ से यहाँ गिर गया है । (उठाना चाहता है) । दोनों:-- इसे मत उठाइए (छुएँ) । क्या इन्होने (इस रक्षासूत्र को) ले लिया (उठा लिया) ? (छाती पर हाथ रखे हुई दोनों एक दूसरे को देखने लगती हैं) । राजा:-- किसलिये (आप लोगों द्वारा इस रक्षा-सूत्र को उठाने से) मैं रोका गया हूँ ? पहली:-- महाराज, सुनिये । यह अपराजिता नाम की ओषधि भगवान्‌ कश्यप के द्वारा इस (बालक) के जातकर्म (संस्कार) के समय दी गयी थी । भूमि पर गिरी हुई इस (ओषधि) को माता, पिता और स्वयं को छोडकर अन्य कोई नहीं उठाता है । राजा:-- यदि (अन्य कोई इसको) उठा लेता है (तो) ? पहली:-- तो उसको सर्प होकर डंस लेती (काट लेती) है । राजा:-- कभी आप दोनों के द्वारा इस (ओषधि) का (साँप के रूप में) बदलना (विक्रिय) होना देखा गया है ? दोनो:-- अनेक बार । राजा:-- (प्रसन्नतापूर्वक, अपने मन में) मैं अपने पूर्ण हुये मनोरथ का अभिनन्दन क्यों न करू । (बालक को छाती से लगा लेता है) दूसरी:-- हे सुव्रता, आओ । इस वृत्तान्त को नियम में लगी हुई शकुन्तला से कह दें । (दोनो निकल जाती हैं) बालक:-- मुझको छोड़ो । मैं तो माँ के पास जाउंगा । राजा:-- बेटे, मेरे साथ ही तुम माँ का अभिनन्दन करोगे । बालक:-- मेरे पिता तो दुष्यन्त हैं । तुम नहीं । राजा:-- (मुस्कराकर) यह विवाद ही (मुझको) विश्वास दिला रहा है (कि तू मेरा पुत्र है) । (तत्पश्चात्‌ एक चोटी को धारण करने वाली शकुन्तला प्रवेश करती है) । शकुन्तला:-- (सर्प के रूप में) बदलने (विकार-परिवर्तन) के समय भी सर्वदमन की औषधि को अपनी स्वाभाविक दशा में ही रहने (अर्थात्‌ सर्प के रूप में न बदलने) (के समाचार) को सुनकर (भी) मुझे अपने भाग्य पर आशा नहीं थी । अथवा जैसा कि सानुमती के द्वारा कहा गया था, उस प्रकार यह सम्भव भी है (कि पतिदेव मुझे खोजते हुये यहां आये हो) । राजा:-- (शकुन्तला को देखकर) अरे, ये वही शकुन्तला है जो यह जो अत्यन्त मलिन वस्त्रों को पहनी हुई, नियम-पालन के कारण कृश (दुर्बल) मुखवाली, एक चोटी (वेणी) को धारण की हुई पवित्र आचरण वाली (ये शकुन्तला) अत्यन्त निर्दय मेरे (इतने) लम्बे (दीर्घकालिक) विरह-व्रत को धारण कर रही है ।
शकुन्तला:-- (पश्चताप के कारण मलिन राजा को देखकर) ये तो आर्यपुत्र के सदृश नहीं है । तो यह कौन इस समय मङ्गल रक्षाकरण्डक को धारण करने वाले मेरे पुत्र को (अपने) शरीर के स्पर्श से दूषित कर रहा है । बालक:-- (माता के पास जाकर) माँ, यह कोई (अपरिचित) पुरुष "पुत्र" ऐसा कहकर मेरा आलिङ्गन कर रहा है । राजा:-- प्रिये, तुम्हारे प्रति की गयी मेरी क्रूरता भी (मेरे) अनुकूल परिणाम वाली हो गयी है, क्योकि अब मैं अपने को तुम्हारे द्वारा पहचाना हुआ देख रहा हूँ । शकुन्तला:-- (अपने मन में) हृदय, धैर्य रखो, धैर्य रखो। भाग्य ने द्वेषभाव छोड़कर मेरे ऊपर कृपा की है। ये आर्यपुत्र (पतिदेव) ही हैं। राजा:-- हे सुमुखी (सुन्दरी), सौभाग्य से स्मरण हो जाने के कारण अज्ञान रूपी अन्धकार से विमुक्त मेरे समक्ष तुम (उसी प्रकार) उपस्थित हो गयी हो, (जिस प्रकार) ग्रहण के समाप्त होने पर (चन्द्रमा की पत्नी) रोहिणी चन्द्रमा के संयोग (मिलन) को प्राप्त कर लेती है (अर्थात् चन्द्रमा से मिल जाती है)।
शकुन्तला:-- जय हो, आर्यपुत्र की जय हो । (आधा ही कहने पर आंसुओं से गला भर जाने के कारण रुक जाती है)। राजा:-- (गले में) आंसू के कारण जयशब्द के रोक लिये जाने पर भी मैंने (एक प्रकार से) विजय प्राप्त कर ली, क्योकि बिना प्रसाधन (सजावट) के भी लाल ओटों से युक्त तुम्हारा मुख देख लिया ।
बालक:-- माँ, यह कौन हैं ? शकुन्तला:-- बेटा, अपने भाग्य से पूछो । राजा:-- (शकुन्तला के पैरों पर गिरकर} हे सुन्दरी, तुम्हारे हृदय से (मेरे द्वारा किये गये) परित्याग का दुःख दूर हो जाना चाहिये । उस समय (तुम्हारे परित्याग के समय) मेरे मन में कुछ (विलक्षण) अज्ञान उत्पत हो गया था । क्योंकि शुभ (मङ्गलमय) वस्तु के विषय में प्रबल तमोगुण वाले लोगों की प्रवृत्तियां ऐसी ही (हो जाती हैं) । अन्धा व्यक्ति शिर पर डाली गयी (पुष्पो की) माला को भी साँप समझकर फ़ैंक देता है ।
शकुन्तला:-- आर्यपुत्र उठें । निश्चय ही पुण्यकर्म का अवरोधक मेरा पूर्वजन्म में किया हुआ (पाप) उन दिनों फलोन्मुख था, जिससे दयालु होते हुये भी आर्यपुत्र (आप) मेरे प्रति अनुरागहीन (विरस) हो गये थे । (राजा उठता है) शकुन्तला:-- अच्छा, आर्यपुत्र के द्वारा दुःखी यह व्यक्ति कैसे याद किया गया ? राजा:-- दुःख (विषाद) रूपी बाण के निकल जाने पर मैं बतलाऊंगा । हे सुन्दरी (सुन्दर शरीर वाली), तुम्हारे अधर (निचले ओठ) को पीड़ित करते हुये जो अश्रुकण (आँसू की बूंदे) मेरे द्वारा मोहवश (अज्ञानवश) पहले (परित्याग के समय) उपेक्षित कर दिये गये थे। (अर्थात् जिनकी मैंने उपेक्षा कर दी थी), कुछ तिरछी बरौनियों (पलकों) में लगे हुये उस आँसू को (अपने हाथों से) पोंछकर अब मैं पञ्चात्ताप से रहित हो जाऊँ ।
शकुन्तला:-- (नामाङ्कित अँगूठी को देखकर) आर्यपुत्र, यह वही अँगूठी है (जो आप के द्वारा मेरी उंगली में पहनायी गयी थी) । राजा:-- वास्तव में इस अँगूठी के मिलने से ही तो (मुझे तुम्हारी) याद आयी । शकुन्तला:-- इस (अँगूठी) के द्वारा बहुत बुरा किया गया कि आप को विश्वास दिलाने के समय यह दुर्लभ हो गयी थी । राजा:-- तो (दुष्यन्त रूपी) वसन्त ऋतु के मिलन के चिह्न (अँगूठीरूपी) पुष्प को (शकुन्तला रूपी) लता धारण करें । शकुन्तला:-- मैं इस (अँगूठी) का विश्वास नहीं करती हूँ । आर्यपुत्र ही इसे धारण करें । (तत्पश्चात्‌ मातलि प्रवेश करता है) मातलि:-- सौभाग्य से (अपनी) धर्मपत्नी के मिलन तथा पुत्र का मुख देखने के कारण चिरञ्जीवी (आप) वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं (अर्थात्‌ पत्नी तथा पुत्र के मिलन पर आप को बधाई है) । राजा:-- मेरे मनोरथ को (आज) स्वादिष्ट फल प्राप्त हुआ है । मातलि; यह समाचार इन्द्र को तो ज्ञात नहीं हुआ होगा ? मातलि:-- (मुस्कराते हुये) ऐश्वर्यशालियों को कौन सी बात अज्ञात होती है ? (अर्थात्‌ कोई नहीं) चिरञ्जीवी (आप) आईये । भगवान्‌ कश्यप (मारीच) आप को दर्शन दे रहे हैं । राजा:-- शकुन्तला, पुत्र को संभालो । तुमको आगे कर मैं भगवान्‌ (कश्यप) का दर्शन करना चाहता हूँ । शकुन्तला:-- आर्यपुत्र के साथ गुरुजन के समीप जाने में मैं लज्जा कर रही हूँ । राजा:-- अभ्युदय के समय ऐसा करना ही चाहिये । आओ; आओ । (सभी घूमते हैं) (तत्पश्चात्‌ अदिति के साथ आसन पर बैठे हुये कश्यप प्रवेश करते हैं) कश्यप:-- (राजा को देखकर) दाक्षायणि (दक्ष की पुत्री, अदिति), ये तुम्हारे पुत्र (इन्द्र) की रणभूमि में आगे-आगे चलने वाले दुष्यन्त इस नाम से विख्यात भूमण्डल (पृथ्वी) के स्वामी (राजा) हैं, जिनके धनुष के द्वारा सम्पन्न (सम्पादित) हो गया है कार्य जिसका ऐसा तेज (तीक्ष्ण) धार से युक्त वह (जगत्‌ प्रसिद्ध) वज्र इन्द्र का आभूषण (मात्र बनकर) रह गया है (अर्थात्‌ वह दायित्व विहीन होने से बेकार हो गया है) ।
अदिति:-- इनकी आकृति (ही) प्रभाव का अनुमान कराने योग्य है (अर्थात्‌ इनकी आकृति से ही इनके प्रभाव का अनुमान किया जा सकता है) । मातलि:-- चिरंजीवी, ये देवताओं के माता-पिता पुत्रप्रेम-सूचक (वात्सल्य प्रेम से युक्त) नत्रो से आप को देख रहे हैं । उनके समीप चलिये । राजा:-- मातलि ! मुनि लोग जिस (जोड़े) को बारह रूपों मे स्थित (विद्यमान) तेज (सूर्य) का कारण (जनक) कहते हैं, जिस (जोड़े) ने तीनों लोकों के पालक (रक्षक) और यशभाग के अधिकारी देवताओं के स्वामी (इन्द्र) को जन्म दिया है, जिस (जोड़े) में स्वयम्भूः परम पुरुष (विष्णु) ने भी (वामनावतार के रूप में) जन्म लेने के लिये आश्रय (स्थान) बनाया है, दक्ष और मरीचि से उत्पन्न तथा ब्रह्मा से एक पीढ़ी का व्यवधान (अन्तर) वाला (जगद्विदित) यह वही (अदिति और कश्यप का) जोड़ा है।
मातलि:-- और क्या (अर्थात् बिल्कुल ठीक है)। राजा:-- (समीप में जाकर) आप दोनों को इन्द्र का आज्ञाकारी दुष्यन्त प्रणाम करता है। कश्यप:-- बेटा, दीर्घजीवी होओ (बहुत दिनों तक जीओ)। और पृथ्वी का पालन करो। अदितिः-- बेटा, अद्वितीय महारथी होओ। शकुन्तला:-- पुत्र के साथ मैं आप दोनों के चरणों की वन्दना करती हूँ। कश्यप:-- बेटी, तुम्हारे) पति (दुष्यन्त) इन्द्र के सामान (हैं) पुत्र (सर्वदमन) (इन्द्र-पुत्र) जयन्त के समान (है) तुम पुलोमा की पुत्री (अर्थात्‌ इन्द्राणी) के समान बनो । (इसके अतिरिक्त) दूसरा आशीर्वाद तुम्हारे योग्य नहीं है ।
अदिति:-- बेटी, पति की अत्यन्त प्रिय होओ और यह चिरञ्जीवी बालक (माता और पिता) दोनो कुलों को आनन्दित करने वाला होवे । तुम सब बैठो । (सभी प्रजापति कश्यप के चारो ओर बेठ जाते हैं) कश्यप:-- (प्रत्येक को निर्देश करते हुये) यह साध्वी (पतिव्रता) शकुन्तला है। यह सगुणों से युक्त (सगुण-सम्पत्र) पुत्र (सर्वदमन) है। यह आप (राजा दुष्यन्त) हैं। (इस प्रकार) सौभाग्य से श्रद्धा, वित्त और विधि - ये तीनों वस्तुयें एक स्थान पर मिल गयी हैं।
राजा:-- भगवन्‌ , पहले अभीष्ट की प्राप्ति (सिद्धि) हो गयी । तत्पश्चात्‌ (आपका) दर्शन हुआ । अतः यह आप की कृपा अनुपम (अपूर्व) है । क्योकि पहले फूल निकलता है, तत्पश्चात्‌ फल (बनता है) । पहले बादलों का उद्धव (होता है) (अर्थात्‌ पहले बादल घिरते हैं), उसके बाद जल (बरसता है) । कारण ओर कार्य का यही क्रम है । किन्तु आप की कृपा के आगे-आगे (ही) सम्पत्तियां (चलती हैं) ।
मातलि:-- (भाग्य के) विधाता लोग इसी प्रकार कृपा करते हैं । राजा-- भगवन्‌ , गान्धर्व-विधि से विवाह कर (फिर) कुछ समय के बाद (शा््खरव आदि) बाधुजनों के द्वारा (मेरे पास) लायी गयी आप की आज्ञाकारिणी इस (शकुन्तला) को स्मरण की दुर्बलता (शिथिलता) के कारण (इसका) परित्याग कर मैं आपके समान गोत्र वाले (आपके वंशज) आदरणीय कण्व के प्रति अपराधी हूँ । बाद में अँगूठी के देखने से मुझे ज्ञात हुआ कि ये (कण्व) की पुत्री (मेरे द्वारा) पहले विवाह की गयी थी ( अर्थात्‌ मैंने उनकी पुत्री से पहले विवाह किया था) यह सब बात मुझको विचित्र सी (आश्चर्यजनक सी) लगती है । जिस प्रकार (हाथी) के सामने होने पर (यह) हाथी नहीं है - ऐसा (निश्चय हो) तदन्तर उसके चले जाने पर (यह हाथी था अथवा नही - ऐसा) सन्देह हो और (उसके) पैरों के चिन्हों को देखकर (उसके हाथी होने का) विश्वास (बोध) हो जाय, उसी प्रकार का मेरे मन (चित्त) का विकार था ।
कश्यप:-- बेटा, तुम अपने अपराध की शङ्का मत करो । तुम में चित्तविकार की बात भी युक्तिसङ्गत नहीं है । सुनो । राजा:-- मैं (सुनने के लिये) सावधान हूँ । कश्यप:-- ज्यों ही अप्सरातीर्थ घाट (अवतरण) से अत्यन्त व्याकुल (प्रत्यक्ष विकलता वाली) शकुन्तला को लेकर मेनका अदिति (दाक्षायणी) के पास आयी, तभी मैंने ध्यान से जान लिया कि दुर्वासा के शाप के कारण यह बेचारी सहधर्मचारिणी आप के द्वारा परित्याग कर दी गयी है, (इसमें) और कोई कारण नहीं है। और वह (शाप) अँगूठी के देखने पर समाप्त हो जाने वाला था। राजा:-- (लम्बी साँस लेकर) अब मैं लोकापवाद (वननीय) से मुक्त हो गया हूँ। शकुन्तला:-- (अपने मन में) सौभाग्य से आर्यपुत्र अकारण परित्याग करने वाले नहीं है। मुझे कब शाप दिया गया था यह याद नहीं है। अथवा प्राप्त हुआ भी वह शाप वियोग के कारण शून्य हृदय वालों मेरे द्वारा नहीं जाना गया। अर्थात् शून्य हृदय वाली मैं उस शाप को नहीं जान पायी। इसीलिये सखियों के द्वारा (आवश्यकता पड़ने पर) पति को अँगूठी दिखाने के लिये मैं सहेजी गयी (आदेश दी गयी) थी। कश्यप:-- बेटी तुम कृतार्थ हो गयी हो। तो अब अपने पति के प्रति तुम्हारे द्वारा क्रोध नहीं किया जाना चाहिये। देखो शाप के कारण स्मृतिशक्ति के अवरुद्ध हो जाने से कठोर पत्ति (राजा दुष्यन्त) के द्वारा तुम्हारा परित्याग किया गया था किन्तु (अब) अज्ञान विमुक्त (उस पति) पर तुम्हारा ही आधिपत्य (अधिकार) होगा। न कि सपत्नियों का। रूप स्वच्छताविहीन (धूल के कारण अस्वच्छ) शीशे में प्रतिबिम्ब नहीं दिखायी देता, किन्तु (उस शीशे के) स्वच्छ हो जाने पर (प्रतिबिम्ब) आसानी से दिखायी देने लगता है।
राजा:-- जैसा पूज्य आप ने कहा (वह ठीक ही है)। कश्यप:-- बेटा, क्या तुमने हमारे द्वारा विधिपूर्वक किये गये जातकर्म (संस्कार) वाले शकुन्तला से उत्पन्न पुत्र का अभिनन्दन कर लिया है। राजा:-- भगवन्, यहाँ (इसी पर) मेरे वंश की प्रतिष्ठा (आश्रित) है। (बालक को हाथ से पकड़ता है)। कश्यप:-- आप इसको उसी प्रकार होने वाला चक्रवर्ती (सम्राट) समझें। देखिए अद्वितीय महारथी यह उ‌द्घात रहित (अस्खलित) होने से शान्त गति वाले रथ से सागरों को पार कर भविष्य में सात द्वीपों वाली पृथ्वी को जीतेगा। यहाँ (आश्रम में) प्राणियों का बलपूर्वक दमन करने (वश में करने) के कारण (इसका नाम) 'सर्वदमन' है। बाद (भविष्य) में लोक (संसार) का भरण-पोषण करने के कारण "भरत" इस नाम को प्राप्त करेगा। अर्थात् "भरत" इस नाम से विख्यात होगा।
राजा:-- आप के द्वारा किये गये संस्कार से सम्पन्न इस (बालक) में हम सब कुछ आशा करते हैं । अदिति:-- भगवन्, पुत्री (शकुन्तला) की (पूर्ण हुयी) इस अभिलाषा (के समाचार) को विस्तारपूर्वक कण्व को भी बता देना चाहिये। पुत्री को अत्यधिक स्नेह करने वाली मेनका तो (हम लोगों की) सेवा करती हुयी यहाँ ही हैं। शकुन्तला:-- (अपने मन में) भगवती (अदिति) के द्वारा वस्तुतः मेरे मन की बात कही गयी है (भगवती अदिति ने मेरे मन की बात कही है)। कश्यप:-- तपस्या के प्रभाव से सभी बातें महात्मा (कण्व) के प्रत्यक्ष ही हैं (अर्थात् तपस्या के प्रभाव से कण्व को सब कुछ ज्ञात है)। राजा:-- इसीलिये ये (सब कुछ जान के कारण ही कण्व) मुनि मेरे ऊपर अधिक क्रुद्ध नहीं (हुये)। कश्यप:-- तो भी यह शुभ (प्रिय) समाचार हम लोगों के द्वारा (कण्व को) सुना (बता) दिया जाना चाहिये। अरे कौन-कौन है यहाँ ? शिष्य:-- (प्रवेश करके) भगवन्, यह मैं हूँ। कश्यप:-- गालव ! (तुम) अभी आकाश-मार्ग से जाकर मेरे आदेशानुसार महात्मा (कण्व) से (यह) शुभ (प्रिय) समाचार कहना कि पुत्र-सहित शकुन्तला को (दुर्वासा के द्वारा दिये गये) शाप से निवृत्त होने पर स्मृतियुक्त दुष्यन्त के द्वारा (अङ्गीकार) कर ली गयी। शिष्य:-- पूज्य आप जैसी आज्ञा देते हैं। (निकल जाता है) कश्यप:-- बेटा, तुम भी अपने पुत्र और पत्नी के साथ (अपने) मित्र इन्द्र के रथ पर चढ़कर अपनी राजधानी (हस्तिनापुर) को प्रस्थान करो । राजा:-- पूज्य, आप जो आदेश (आशा) देते हैं। कश्यप:-- इन्द्र तुम्हारी प्रजाओं के लिये पर्याप्त (अर्थात् पर्याप्त जल बरसावे) । तुम भी यशों का विस्तार करके इन्द्र को प्रसन करो। इस प्रकार (स्वर्ग तथा मर्त्य) दोनों लोकों के उपकार (अनुमह) के कारण प्रशंसनीय कार्यों से तुम दोनों सैकड़ों युगों को बिताओ।
राजा:-- भगवन्‌ , मैं यथाशक्ति (लोगों के) कल्याण के लिये प्रयत्न करूंगा । कश्यप:-- बेटा, मैं तुम्हारा ओर क्या प्रिय उपकार करूं ? राजा:--- क्या इससे भी अधिक और प्रिय कार्य है ? यदि भगवान्‌ (आप) कुछ और प्रिय करना चाहते हैं तो यह हो जाय । (भरतवाक्य) राजा प्रजा के हित (कल्याण) के लिये प्रयत्नशील हो । ज्ञान के कारण वरिष्ठ (महान्‌) लोगों (विभूतियो) की वाणी (कृति) गौरव (प्रतिष्ठा) को प्राप्त करे । सर्वशक्तिमान्‌ स्वयम्भू शिव मेरे भी पुनर्जन्म को नष्ट करें (अर्थात्‌ पुनर्जन्म से मुक्त करें) ।
(सभी निकल जाते हैं) । ॥ सप्तम अङ्क समाप्त ॥ ॥ अभिज्ञानशाकुन्तल नामक यह नाटक समाप्त ॥
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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