मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 29
अदितिः- जाते, भरतुर्बहुमता भव । अयं च दीघायुर्वत्सक उभयकुलनन्दनो भवतु । उपविशत । (सवे प्रजापतिमभितः उपविशम्ति) | मारीचः- (एकैकं निर्दिशन्) दिष्ट्या शकुन्तला साध्वी सदपत्यमिदं भवान् । श्रद्धा वित्तं विधिश्चेति त्रितयं तत् समागतम् ।।
अदिति:-- बेटी, पति की अत्यन्त प्रिय होओ और यह चिरञ्जीवी बालक (माता और पिता) दोनो कुलों को आनन्दित करने वाला होवे । तुम सब बैठो । (सभी प्रजापति कश्यप के चारो ओर बेठ जाते हैं) कश्यप:-- (प्रत्येक को निर्देश करते हुये) यह साध्वी (पतिव्रता) शकुन्तला है। यह सगुणों से युक्त (सगुण-सम्पत्र) पुत्र (सर्वदमन) है। यह आप (राजा दुष्यन्त) हैं। (इस प्रकार) सौभाग्य से श्रद्धा, वित्त और विधि - ये तीनों वस्तुयें एक स्थान पर मिल गयी हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें