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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 8
मातलिः-क्चषणादायुष्मान्‌ स्वाधिकारभूमौ वर्तिष्यते । राजा-(अधोऽवलोक्य) वेगावतरणादाश्चर्यदरशनः संलक्ष्यते मनुष्यलोकः । तथा हि-- शौलानामवरोहतीवः शिखरादुन्मज्जतां मेदिनी पर्णाभ्यन्तरलीनतां विजहति स्कन्धोदयात्‌ पादाः । सन्तानैस्तनुभावनष्टसलिला व्यक्ति भजन्त्यापगा | केनाप्युत्क्िपतेव . पश्यं भुवनं पंत्योर्धमानीयते ।।
मातलि:-- क्षरभर मे चिरञ्जीवी (आप) अपने अधिकार वाली भूमि पर रहेंगे (अर्थात्‌ अपने राज्य में पहुंच जाएंगे)। राजा:-- ( नीचे देखकर) वेग से उतरने के कारण मनुष्य-लोक आश्चर्यजनक दृश्य वाला दिखायी पड़ रहा है । क्योकि पृथ्वी ऊपर की ओर उठते हुये (उभरते हुये) पर्वतों के शिखर से मानो नीचे उतर रही है । वृक्ष तनों के प्रकट होने (दिखायी पड़ने) के कारण (मानो) पत्तों के भीतर छिपना छोड़ रहे हैं । कृशता (क्षीणता) के कारण जलविहीन सी दिखायी पड़ने वाली नदियाँ विस्तार के कारण (मानो) प्रकट हो रही हैं । देखिये, ऐसा मालूम पड़ता है कि भूमण्डल मानो किसी के द्वारा उछालकर मेरे पास लाया जा रहा है ।
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