मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 10
राजा- तेन हानतिक्रमणीयानि श्रेयासि । प्रदक्षिणीकृत्य भगवन्तं गन्तुमिच्छामि । मातलि- प्रथमः कल्पः । (नास्येनावतीणौ) राजा-(आश्चर्यवत्)--उपोदशब्दा न रथाङ्गनेमयः प्रवर्तमानं न च दृश्यते रजः अभूतलस्पश्तिया ऽनिरुदधतस्तवावतीर्णोऽपि रथो ने लक्ष्यते ।।
राजा:-- तो कल्याण करने वाली वस्तुएँ अनुलंघनिय होती हैं । मैं भगवान्‌ (कश्यप) की प्रदक्षिणा करके ही (यहाँ से) जाना चाहता हूँ । मातलि:-- यह विचार ठीक है । (अभिनयपूर्वक दोनों उतर गये)। राजा:-- (अश्चर्यपूर्वक) पृथ्वी का स्पर्श न होने के कारण रथ के पहियों की नेमियों (प्रान्तभागों) ने शब्द नहीं किया है और (कहीं) धूल भी उठती (उड़ती) हुई नहीं दिखायी पड़ रही है । (झटका उद्घात) न लगने के कारण (ऊपर-नीचे न होने के कारण) तुम्हारा (आपका) रथ (पृथ्वी पर) उतरा हआ भी (उतर गया है ऐसा) प्रतीत नहीं हो रहा है ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें