राजा- तेन हानतिक्रमणीयानि श्रेयासि । प्रदक्षिणीकृत्य भगवन्तं गन्तुमिच्छामि ।
मातलि- प्रथमः कल्पः । (नास्येनावतीणौ)
राजा-(आश्चर्यवत्)--उपोदशब्दा न रथाङ्गनेमयः प्रवर्तमानं न च दृश्यते रजः अभूतलस्पश्तिया ऽनिरुदधतस्तवावतीर्णोऽपि रथो ने लक्ष्यते ।।
राजा:--
तो कल्याण करने वाली वस्तुएँ अनुलंघनिय होती हैं । मैं भगवान् (कश्यप) की प्रदक्षिणा करके ही (यहाँ से) जाना चाहता हूँ ।
मातलि:--
यह विचार ठीक है । (अभिनयपूर्वक दोनों उतर गये)।
राजा:--
(अश्चर्यपूर्वक) पृथ्वी का स्पर्श न होने के कारण रथ के पहियों की नेमियों (प्रान्तभागों) ने शब्द नहीं किया है और (कहीं) धूल भी उठती (उड़ती) हुई नहीं दिखायी पड़ रही है । (झटका उद्घात) न लगने के कारण (ऊपर-नीचे न होने के कारण) तुम्हारा (आपका) रथ (पृथ्वी पर) उतरा हआ भी (उतर गया है ऐसा) प्रतीत नहीं हो रहा है ।
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