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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 12
राजा-- नमस्ते कष्टतपसे । मातलिः- (संयतप्रग्रहं रथं कृत्वा) एतावदितिपरिवर्धितमन्दारवृक्षं प्रजापतेराश्रमं प्रविष्टौ स्वः । राजा--स्वगदिधिकतरं निर्वृतिस्थानम्‌ । अमृतहुदमिवावगाढोऽस्मि । मातलिः- (रथं स्थापयित्वा) अवतरत्वायुष्मान्‌ । राजा-- (अवतीर्य) मातले, भवान्‌ कथमिदानीम्‌ ? मातलिः-सयन्नितो मया रथः । वयमप्यवतरामः । (तथा कृत्वा) इत आयुष्मान्‌ , (परिक्रम्य) दृश्यन्तामत्रभवतामृषीणां तपोवनभूमयः । राजा-- ननु विस्मयादवलोकयामि । प्राणानामनिलेन वृत्तिरुचिता सत्कल्पवृक्षे वने तोये काञ्चनपडरेणुकपिशे धर्माभिषेकक्रिया । ` ध्यानं रतनशिलातलेषु विवबुधस्रीसन्निधौ संयमो यत्‌ काङ्क्षन्ति तपोभिरन्यमुनयस्तस्मिस्तपस्यन्त्यमी ।।
राजा:-- कठोर तपस्या करने वाले (मुनि) को (मेरा) प्रणाम है । मातलि:-- (रथ के घोड़ों की लगाम खींचकर) अदिति के द्वारा (जल सेचनादि द्वारा) परिवर्धित मन्दार वृक्ष वाले, प्रजापति (कश्यप) के आश्रम में हम लोग प्रविष्ट हो गये हैं । राजा:-- स्वर्ग से भी अधिक शान्तिप्रद (सुखप्रद) स्थान है । (इस स्थान में आकर) मानो मैं अमृत के सरोवर मे डुबकी लगा रहा हूँ । मातलि:-- (रथ को रोककर) चिरञ्जीवी (आप) उतरें । राजा:-- (उतरकर) हे मातलि, अब आप क्या (करेंगे) ? मातलि:-- मेरे द्वारा रथ अच्छी प्रकार रोक दिया गया है । हम लोग भी (अब) उतरते हैं । (वेसा कर अर्थात्‌ उतरकर) चिरञ्जीविन्‌ , इधर से (आईये) । (घूमकर) ऋषियों के तपोवन के स्थानों को (आप) देखें । राजा:-- वस्तुतः मैं (स्थानों को) आश्चर्य से देख रहा हूँ । कल्पवृक्षों वाले (इस) वन में (ये मुनि) वायु भक्षण के द्वारा (अपना) जीवन-यापन करने के अभ्यस्त हैं, स्वर्ण-कमलों के पराग से पीले जल में धार्मिक स्नान-कार्य करते हैं, रत्नों के शिलाखण्डों पर (बैठकर) ध्यान लगाते हैं तथा देवाङ्गनाओं के समीप में रहकर संयम (इन्दरिय-निग्रह) करते हैं । दूसरे मुनि (अपनी) तपस्याओं के द्वारा जिन (वस्तुओं) को चाहते हैं, उन्हीं (वस्तुओं के बीच) में ये रहकर (मुनि) तपस्या करते हैं ।
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