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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 24
बालः- मातः क एषः ? शकुन्तला-- वत्स, ते भाग्यधेयानि पृच्छ । राजा-(शकुन्तलायाः पादयोः प्रणिपत्य)-- सुतनु हृदयात्‌ प्रत्यादेशव्यलीकमपैतु ते क किमपि मनसः सम्मोहो मे तदा बलवानभूत्‌ । प्रवलतमसामेवप्रायाः शुभेषु हि वृत्तयः स्रजमपि शिरस्यन्धः शप्तं धुनोत्यहिशङ्कवाः।।
बालक:-- माँ, यह कौन हैं ? शकुन्तला:-- बेटा, अपने भाग्य से पूछो । राजा:-- (शकुन्तला के पैरों पर गिरकर} हे सुन्दरी, तुम्हारे हृदय से (मेरे द्वारा किये गये) परित्याग का दुःख दूर हो जाना चाहिये । उस समय (तुम्हारे परित्याग के समय) मेरे मन में कुछ (विलक्षण) अज्ञान उत्पत हो गया था । क्योंकि शुभ (मङ्गलमय) वस्तु के विषय में प्रबल तमोगुण वाले लोगों की प्रवृत्तियां ऐसी ही (हो जाती हैं) । अन्धा व्यक्ति शिर पर डाली गयी (पुष्पो की) माला को भी साँप समझकर फ़ैंक देता है ।
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