बालः- मातः क एषः ?
शकुन्तला-- वत्स, ते भाग्यधेयानि पृच्छ ।
राजा-(शकुन्तलायाः पादयोः प्रणिपत्य)--
सुतनु हृदयात् प्रत्यादेशव्यलीकमपैतु ते क किमपि मनसः सम्मोहो मे तदा बलवानभूत् । प्रवलतमसामेवप्रायाः शुभेषु हि वृत्तयः स्रजमपि शिरस्यन्धः शप्तं धुनोत्यहिशङ्कवाः।।
बालक:--
माँ, यह कौन हैं ?
शकुन्तला:--
बेटा, अपने भाग्य से पूछो ।
राजा:--
(शकुन्तला के पैरों पर गिरकर} हे सुन्दरी, तुम्हारे हृदय से (मेरे द्वारा किये गये) परित्याग का दुःख दूर हो जाना चाहिये । उस समय (तुम्हारे परित्याग के समय) मेरे मन में कुछ (विलक्षण) अज्ञान उत्पत हो गया था । क्योंकि शुभ (मङ्गलमय) वस्तु के विषय में प्रबल तमोगुण वाले लोगों की प्रवृत्तियां ऐसी ही (हो जाती हैं) । अन्धा व्यक्ति शिर पर डाली गयी (पुष्पो की) माला को भी साँप समझकर फ़ैंक देता है ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।