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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 5
मातलिः- सदृशमेवैतत्‌ । (स्तोकमन्तरमतीत्य) आयुष्मन्‌ , इतः पश्य नाकपूष्ठप्रतिष्ठितस्य सौभाग्यमात्मयशसः । विच्छित्तिशेषैः सुरसुन्दरीणां वर्णैरमी कल्पलतांशुकेषु । विचिन्त्य गीतक्षममर्थजातं दिवौकसस्त्वच्चरितं लिखन्ति ।।
मातलि:-- यह (कथन आप के) अनुरूप ही है । (कुछ दूर आगे जाकर) चिरञ्जीविन्‌ , स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठित अपने यश के सौभाग्य को इधर देखिये । (आयुष्मान्‌) ये (स्वर्ग-निवासी) देवता गेय अर्थसमूह (भावों) को सोचकर (गेयपद्यों को बनाकर) देवाङ्गनाओं के अङ्गराग (प्रसाधन) से अवशिष्ट रङ्गो से कल्पलता (कल्पवृक्ष) के रेशमी वस्त्रों पर आप के चरित को लिख रहे हैं ।
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