मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 3
मातलिः- किमिव नामायुष्मानमरेश्चरान्नार्हति ? पश्य- सुखपरस्य हरेरुभयैः कृतं त्रिदिवमुद्धृतदानवकण्टकम्‌ । तव॒ शरैरधुना नतपर्वभिः पुरुषकेसरिणश्च पुरा नखैः ।।
मातलि:-- चिरञ्जीवी, आप कौन सी वस्तु देवेन्द्र से नहीं प्राप्त कर सकते ? देखिये इस समय (अर्थात्‌ वर्तमान काल में) झुकी हुई गांठो वाले आप के बाणों और प्राचीन काल मे उंगलियों के जोड़ पर मुड़े हुए नरसिंह (भगवान्‌) के नाखूनों के द्वारा, (इस प्रकार) इन (बाणों और नाखुनों) दोनों के द्वारा सुखोपभोगासक्त इन्द्र के स्वर्ग को दावनवरूपी काँटों से रहित कर दिया गया ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें