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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 1
(ततः प्रविशत्याकाशयानेनरथाधिरूढो राजा मातलिश्च) राजा--मातले, अनुष्ठितनिदेशोऽपि मघवतः सत्क्रियाविशेषादनुपयुक्तमिवात्ानं समर्थये। मातलिः- (सस्मितम्‌) आयुष्मन्‌ , उभयमप्यपरितोषं समर्थये । प्रथमोकृतं मरुत्वतः प्रतिपत्या लघु मन्यते भवान्‌ । गणयत्यवदानविस्मितो भवतः सोऽपि न सक्क्रियागुणान्‌ ।।
(तत्पश्चात्‌ आकाशमार्ग से रथ पर बैठे हुये राजा और मातलि प्रवेश करते हैं) राजा:-- हे मातलि, (इन्द्र के दुर्जय दैत्यों के वध रूप) आदेश का परिपालन कर देने पर भी इन्द्र के द्वारा किये गये विशेष सत्कार के कारण मैं अपने को (उस प्रकार के) सत्कार के लिये अयोग्य-सा समझ रहा हूँ। मातलि:-- (मुस्कराकर) चिरंजीवी, मैं (इन्द्र और आप राजा दुष्यन्त) दोनों को ही असन्तुष्ट समझ रहा हूँ । आप इन्द्र के द्वारा किये गये सत्कार से (इन्द्र के प्रति अपने द्वारा) पहले किये गये उपकार को छोटा (तुच्छ) मानते (समझते) हैं । वह (इन्द्र) भी आप के पराक्रम (विशिष्ट वीरता) से आश्वर्यचकित होकर (आप के प्रति अपने द्वारा दिये गये) सत्कार के महत्त्व को (कुछ भी) नहीं गिनते (समझते) हैं ।
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