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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 31
मातलिः- एवं विधातारः प्रसीदन्ति । राजा-- भगवन्‌ इमामाज्ञाकरीं वो गान्धर्वेण विवाहविधिनोपगम्य कस्यचित्‌ कालस्य बन्धुभिरानीतां स्मृतिशथिल्यात्‌ प्रत्यादिशन्नपराद्धोऽस्मि तत्रभवतो युष्मत्सगोत्रस्य कण्वस्य । पश्चाङ्गुलीयकद्र्शनादूढपूर्वा तदृहितरमवगतोऽहम्‌ । तच्चित्रमिव मे प्रतिभाति । यथा गजो नेति समक्षरूपे तस्मिन्नपक्रामति संशयः स्यात्‌ । पदानि दृष्ट्वा तु भवेत्‌ प्रतीतिस्तथाविधो मे मनसो विकारः ।।
मातलि:-- (भाग्य के) विधाता लोग इसी प्रकार कृपा करते हैं । राजा-- भगवन्‌ , गान्धर्व-विधि से विवाह कर (फिर) कुछ समय के बाद (शा््खरव आदि) बाधुजनों के द्वारा (मेरे पास) लायी गयी आप की आज्ञाकारिणी इस (शकुन्तला) को स्मरण की दुर्बलता (शिथिलता) के कारण (इसका) परित्याग कर मैं आपके समान गोत्र वाले (आपके वंशज) आदरणीय कण्व के प्रति अपराधी हूँ । बाद में अँगूठी के देखने से मुझे ज्ञात हुआ कि ये (कण्व) की पुत्री (मेरे द्वारा) पहले विवाह की गयी थी ( अर्थात्‌ मैंने उनकी पुत्री से पहले विवाह किया था) यह सब बात मुझको विचित्र सी (आश्चर्यजनक सी) लगती है । जिस प्रकार (हाथी) के सामने होने पर (यह) हाथी नहीं है - ऐसा (निश्चय हो) तदन्तर उसके चले जाने पर (यह हाथी था अथवा नही - ऐसा) सन्देह हो और (उसके) पैरों के चिन्हों को देखकर (उसके हाथी होने का) विश्वास (बोध) हो जाय, उसी प्रकार का मेरे मन (चित्त) का विकार था ।
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