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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 13
मातलिः--उत्सर्पिणी खलु महतां प्रार्थना । (परिक्रम्य । आकाशे) अये वृद्धशाकल्य, किमनुतिष्ठति भगवान्‌ मारीचः ? किं व्रवीषि । दाक्षायण्या पतित्रताधर्ममधिकृत्य पृष्टस्तस्यै महर्षिपत्नी सहितायै कथयतीति । राजा--(कर्णं दत्वा) अये, प्रतिपाल्यावसरः खलु प्रस्तावः । मातलिः- (राजानमवलोक्य). अस्मिन्नशोकवृक्षमूले तावदास्तामायुष्मान्‌ , यावत््वामिन्द्रगुरवे निवेदयितुमन्तरान्वेषी भवामि । राजा--यथा भवान्‌ मन्यते । (इति स्थितः) । मातलिः- आयुष्मन्‌ , साधयाम्यहम्‌ । (इति निक्रान्तः)। राजा--(निमित्तं सूचयित्वा)-- मनोरथाय नाशंसे किं बाहो स्पन्दसे वृथा । पूवविधीरितं श्रेयो दुःखं हि परिवर्तते ।।
मातलि:-- बड़े लोगों (महात्माओं) की अभिलाषा सदा उधर्वगामिनी होती है । (घूमकर । आकाश में) हे वृद्ध शाकल्य, भगवान्‌ मारीच (कश्यप) क्या कर रहे हैं ? क्या कह रहे हैं आप ? कि दाक्षायणी (अदिति) के द्वारा पूछे गये पतिव्रता धर्म के विषय में वे (अन्य) महर्षियों की पत्नियों के साथ उस (दाक्षायणी) को उपदेश दे रहे हैं। राजा:-- (कान लगाकर) अरे, (पतिव्रता धर्म का) प्रसंग (प्रस्ताव) ऐसा है कि हमें (उसकी समाप्ति के) अवसर की प्रतीक्षा करनी चाहिये । मातलि:-- (राजा को देखकर) तब तक चिरञ्जीवी (आप) इस अशोक वृक्ष के नीचे बैठें जब तक मैं इंद्र के पिता (मारीच) से (आप के आगमन की सूचना देने के लिये) उचित अवसर खोजता हूँ । राजा:-- जैसा आप (ठीक) समझें । (बैठता है) । मातलि:-- चिरञ्जीवी, मैं जा रहा हूँ । (निकल जाता है) । राजा:-- (शकुन को सूचित करके) मैं (शकुन्तला रूप) अभीष्ट वस्तु (की प्राप्ति) की आशा नहीं करता हूँ । हे (मेरी दाहिनी) भुजा, तुम व्यर्थ (ही) क्यों फड़क रही हो । क्योंकि पहले तिरस्कृत किया गया कल्याण दुख के रूप में बदल जाता है अर्थात्‌ तिरस्कृत कल्याण की परिणति दुख में ही होती है । वस्तुतः वह वापस नहीं आता ।
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