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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 25
शकुन्तला-उत्तिष्ठत्वार्यपुत्रः । नूनं मे सुचरितप्रतिबन्धकं पुराकृतं तेषु दिवसेषु परिणामाभिमुखमासीद्‌ येन सानुक्रोशेऽप्यार्यपुत्रो मयि .विरसः संवृत्तः । (राजोत्तिष्ठति) शकुन्तला--अथ कथमार्यपुत्रेण स्मृतो दुःखभाग्ययं जनः ? राजा- उद्धृतविषादशल्यः कथयिष्यामि । मोहान्मया सुतनु पूर्वमुपेक्षितस्ते यों वीष्यबिन्दुरंधरं परिबधिमोनिः । तं तावदाकुटिलपंक्ष्मविलग्नमद्यं बाष्पं प्रमृज्य विगतानुज्ञेयो भवेयम्‌ ।।
शकुन्तला:-- आर्यपुत्र उठें । निश्चय ही पुण्यकर्म का अवरोधक मेरा पूर्वजन्म में किया हुआ (पाप) उन दिनों फलोन्मुख था, जिससे दयालु होते हुये भी आर्यपुत्र (आप) मेरे प्रति अनुरागहीन (विरस) हो गये थे । (राजा उठता है) शकुन्तला:-- अच्छा, आर्यपुत्र के द्वारा दुःखी यह व्यक्ति कैसे याद किया गया ? राजा:-- दुःख (विषाद) रूपी बाण के निकल जाने पर मैं बतलाऊंगा । हे सुन्दरी (सुन्दर शरीर वाली), तुम्हारे अधर (निचले ओठ) को पीड़ित करते हुये जो अश्रुकण (आँसू की बूंदे) मेरे द्वारा मोहवश (अज्ञानवश) पहले (परित्याग के समय) उपेक्षित कर दिये गये थे। (अर्थात् जिनकी मैंने उपेक्षा कर दी थी), कुछ तिरछी बरौनियों (पलकों) में लगे हुये उस आँसू को (अपने हाथों से) पोंछकर अब मैं पञ्चात्ताप से रहित हो जाऊँ ।
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