कश्यप:--
बेटा, तुम अपने अपराध की शङ्का मत करो । तुम में चित्तविकार की बात भी युक्तिसङ्गत नहीं है । सुनो ।
राजा:--
मैं (सुनने के लिये) सावधान हूँ ।
कश्यप:--
ज्यों ही अप्सरातीर्थ घाट (अवतरण) से अत्यन्त व्याकुल (प्रत्यक्ष विकलता वाली) शकुन्तला को लेकर मेनका अदिति (दाक्षायणी) के पास आयी, तभी मैंने ध्यान से जान लिया कि दुर्वासा के शाप के कारण यह बेचारी सहधर्मचारिणी आप के द्वारा परित्याग कर दी गयी है, (इसमें) और कोई कारण नहीं है। और वह (शाप) अँगूठी के देखने पर समाप्त हो जाने वाला था।
राजा:--
(लम्बी साँस लेकर) अब मैं लोकापवाद (वननीय) से मुक्त हो गया हूँ।
शकुन्तला:--
(अपने मन में) सौभाग्य से आर्यपुत्र अकारण परित्याग करने वाले नहीं है। मुझे कब शाप दिया गया था यह याद नहीं है। अथवा प्राप्त हुआ भी वह शाप वियोग के कारण शून्य हृदय वालों मेरे द्वारा नहीं जाना गया। अर्थात् शून्य हृदय वाली मैं उस शाप को नहीं जान पायी। इसीलिये सखियों के द्वारा (आवश्यकता पड़ने पर) पति को अँगूठी दिखाने के लिये मैं सहेजी गयी (आदेश दी गयी) थी।
कश्यप:--
बेटी तुम कृतार्थ हो गयी हो। तो अब अपने पति के प्रति तुम्हारे द्वारा क्रोध नहीं किया जाना चाहिये। देखो शाप के कारण स्मृतिशक्ति के अवरुद्ध हो जाने से कठोर पत्ति (राजा दुष्यन्त) के द्वारा तुम्हारा परित्याग किया गया था किन्तु (अब) अज्ञान विमुक्त (उस पति) पर तुम्हारा ही आधिपत्य (अधिकार) होगा। न कि सपत्नियों का। रूप स्वच्छताविहीन (धूल के कारण अस्वच्छ) शीशे में प्रतिबिम्ब नहीं दिखायी देता, किन्तु (उस शीशे के) स्वच्छ हो जाने पर (प्रतिबिम्ब) आसानी से दिखायी देने लगता है।
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