(प्रकट रूप में) यह (स्थान) मनुष्यों की अपनी स्वाभाविक गति का विषय नहीं है (अर्थात् मनुष्य अपनी स्वाभाविक शक्ति से इस स्थान तक नहीं पहुँच सकता है) ।
तपस्विनी:--
जैसा महाशय (आप) कहते हैं (वह ठीक है) । अप्सरा (मेनका) से सम्बन्ध होने के कारण इस (बालक) की माँ ने देवताओं के पिता (कश्यप) के आश्रम में (इसको) जन्म दिया है ।
राजा:--
(एक ओर मुख कर) ओह, यह दूसरी आशाजनक (बात) है । (प्रकट रूप में) अच्छा, आदरणीय (इस बालक की माता) किस राजर्षि की पत्नी हैं ?
तपस्विनी:--
(अपनी) धर्मपत्नी का परित्याग करने वाले उस (व्यक्ति) का नाम लेने को कौन सोचेगा (अर्थात् उसका नाम कौन लेगा) ?
राजा:--
(अपने मन में) वस्तुतः यह कथा तो मुझे ही लक्ष्य बना रही है । तो इस बालक की माता का नाम पूछता हूँ । अथवा दूसरे की स्त्री के प्रति (यह) व्यवहार (पृपुछताछ) अनुचित है ।
(मिट्टी का मोर हाथ में ली हुई प्रवेश कर)
तपस्विनी:--
सर्वदमन, पक्षी (शकुन्त) का सौंदर्य देखो ।
बालक:--
(इधर-उधर दृष्टि डालता हुआ) कहाँ है मेरी माँ ?
दोनों:--
नाम की समानता के कारण मातृभक्त (यह बालक) ठगा गया (अर्थात् धोखे में आ गया) ।
दूसरी:--
बेटा इस मिट्टी के मोर की रमणीयता को देखो, (मेरे द्वारा) तुम कहे गये हो (अर्थात् मैने तुमसे यह कहा कि इस मिट्टी के मोर का सौंदर्य देखो) ।
राजा:--
(अपने मन में) क्या शकुन्तला इसकी माता का नाम है ? किन्तु नामों में समानता भी होती है । ठेसा न हो कि मृगतृष्णा की भांति (शकुन्तला) के नाम का प्रसङ्ग मेरे दुःख के लिये कारण हो जाए ।
बालक:--
माँ यह सुन्दर मोर मुझे अच्छा लग रहा है । (खिलौना ले लेता है) ।
पहली:--
(देखकर, घबराहट के साथ) हाय, रक्षाकरण्डक रक्षासूत्र यन्त्र इसकी कलाई में नहीं दिखलायी पड़ रहा है ।
राजा:--
डरें नहीं । इसका यह रक्षाकरण्डक (रक्षासूत्र, रक्षायन्त्र) सिंह के बच्चे की रगड़ से यहाँ गिर गया है । (उठाना चाहता है) ।
दोनों:--
इसे मत उठाइए (छुएँ) । क्या इन्होने (इस रक्षासूत्र को) ले लिया (उठा लिया) ?
(छाती पर हाथ रखे हुई दोनों एक दूसरे को देखने लगती हैं) ।
राजा:--
किसलिये (आप लोगों द्वारा इस रक्षा-सूत्र को उठाने से) मैं रोका गया हूँ ?
पहली:--
महाराज, सुनिये । यह अपराजिता नाम की ओषधि भगवान् कश्यप के द्वारा इस (बालक) के जातकर्म (संस्कार) के समय दी गयी थी । भूमि पर गिरी हुई इस (ओषधि) को माता, पिता और स्वयं को छोडकर अन्य कोई नहीं उठाता है ।
राजा:--
यदि (अन्य कोई इसको) उठा लेता है (तो) ?
पहली:--
तो उसको सर्प होकर डंस लेती (काट लेती) है ।
राजा:--
कभी आप दोनों के द्वारा इस (ओषधि) का (साँप के रूप में) बदलना (विक्रिय) होना देखा गया है ?
दोनो:--
अनेक बार ।
राजा:--
(प्रसन्नतापूर्वक, अपने मन में) मैं अपने पूर्ण हुये मनोरथ का अभिनन्दन क्यों न करू । (बालक को छाती से लगा लेता है)
दूसरी:--
हे सुव्रता, आओ । इस वृत्तान्त को नियम में लगी हुई शकुन्तला से कह दें ।
(दोनो निकल जाती हैं)
बालक:--
मुझको छोड़ो । मैं तो माँ के पास जाउंगा ।
राजा:--
बेटे, मेरे साथ ही तुम माँ का अभिनन्दन करोगे ।
बालक:--
मेरे पिता तो दुष्यन्त हैं । तुम नहीं ।
राजा:--
(मुस्कराकर) यह विवाद ही (मुझको) विश्वास दिला रहा है (कि तू मेरा पुत्र है) ।
(तत्पश्चात् एक चोटी को धारण करने वाली शकुन्तला प्रवेश करती है) ।
शकुन्तला:--
(सर्प के रूप में) बदलने (विकार-परिवर्तन) के समय भी सर्वदमन की औषधि को अपनी स्वाभाविक दशा में ही रहने (अर्थात् सर्प के रूप में न बदलने) (के समाचार) को सुनकर (भी) मुझे अपने भाग्य पर आशा नहीं थी । अथवा जैसा कि सानुमती के द्वारा कहा गया था, उस प्रकार यह सम्भव भी है (कि पतिदेव मुझे खोजते हुये यहां आये हो) ।
राजा:--
(शकुन्तला को देखकर) अरे, ये वही शकुन्तला है जो यह जो अत्यन्त मलिन वस्त्रों को पहनी हुई, नियम-पालन के कारण कृश (दुर्बल) मुखवाली, एक चोटी (वेणी) को धारण की हुई पवित्र आचरण वाली (ये शकुन्तला) अत्यन्त निर्दय मेरे (इतने) लम्बे (दीर्घकालिक) विरह-व्रत को धारण कर रही है ।
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