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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 21
(प्रकाशम्‌) न पुनरात्मगत्या मानुषाणामेष विषयः । तापसी- यथा भद्रमुखो भणति । अप्सरः सम्बन्धेनास्य जनन्यत्र देवगुरोस्तपोवने प्रसूता । राजा- (अपवार्य) हन्त, दितीयमिदमाशाजननम्‌ । (प्रकाशम्‌) अथ सा तत्रभवती किमाख्यस्य राजर्षेः पत्नी ? तपसी- कस्तस्य धर्मदारपरित्यागिनो नाम सद्कीर्तयितुं चिन्तयिष्यति ? राजा- (स्वगतम्‌) इय खलु कथा मामेव लक्ष्यीकरोति । यदि तावदस्य शिशोर्मातरं नामतः पृच्छामि । अथवाऽ नार्यः परदारव्यवहारः । (प्रविश्य मृण्मयुरहस्ता) तापसी- सर्वदमन, शकुन्तलावण्यं प्रेक्षस्व । बालः- (सदृष्टिक्षेपम्‌) कुत्र वा पम माता ? उभे- नामसादृश्येन वञ्चितो मातृवत्सलः । द्वितीया-- वत्स, अस्य मृत्तिकामयूरस्य रम्यत्वं पश्येति भणितोऽसि । राजा-(आत्मगतम्‌) किं वा शकुन्तलेत्यस्य मातुराख्या । सन्ति पुनन मिधेयसादृश्यानि । अपि नाम मृगतृष्णिकेव नाममात्रप्रस्तावो मे विषादाय कल्यते । बालः- मातः, रोचते म एष भद्रमयूरः । प्रथमा-(विलोक्य । सोद्वेगम्‌) अहो रक्षाकरण्डकमस्य मणिबन्धे न दृश्यते । राजा--अलमावेगेन । नन्विदमस्य सिंहशावकविमर्द्‌ परिभ्रष्टम्‌ । (इत्यादातुमिच्छति) । उभे-- मा खल्वेतदवलम्ब्य । कर्थं गृहीतमनेन ? (इति विस्मयादुरोनिहितहस्ते परस्परमवलोकयतः) राजा--किमर्थ प्रतिषिद्धाः स्मः ? प्रथमा-- शृणोतु महाराजः । एषाऽपराजिता नामौषधिरस्य जातकर्मसमये भगवता मारीचेन दत्ता । एतां किल मातापितरावात्मानं च वर्जयित्वाऽपरो भूमिपतितां न गृह्णाति । राजा--अथ गृह्णाति ? प्रथमा- ततस्तं सर्पो भूत्वा दशति । राजा-- भवतीभ्यां कदाचिदस्याः प्रत्यक्षीकृता विक्रिया ? उभे--अनेकशः । राजा-- (सहर्षम्‌ । आत्मगतम्‌) कथमिव सम्पूर्णमपि मे मनोरथं नाभिनन्दामि ? (इति बालं परिष्वजते) । द्वितीया-- सुव्रते, एहि । इमं वृत्तान्तं नियमव्यापृतायै शकुन्तलायै निवेदयावः । (इति निष्क्रान्ते) बालः-- मुञ्च माम्‌ । यावन्मातुः सकाशं गमिष्यामि । राजा- पुत्रक, मया सहैव मातरमभिनन्दिष्यसि । बालकः-- मम खलु तातो दुष्यन्तः । न त्वम्‌ । राजा-- (सस्मितम्‌) एष विवाद एव प्रत्याययति । (ततः प्रविशत्येकवेणीधरा शकुन्तला) शकुन्तला-- विकारकालेऽपि प्रकृतिस्थां सर्वदमनस्यौषधिं श्रुत्वा न मे आशाऽऽसीदात्मनो भागधेयेषु । अथवा यथा सानुमत्माऽऽ ख्यातं तथा सम्भाव्यत एतत्‌ । राजा-(शकुन्तलां विलोक्य) अये, सेयभत्रभवती शकुन्तला । यैषा-- वसने परिधूसरे वसाना नियमक्षाममुखी धृतैकवेणिः । अतिनिष्करुणस्य शुद्धशीला मम दीर्घं विरहव्रतं बिभर्ति ।।
(प्रकट रूप में) यह (स्थान) मनुष्यों की अपनी स्वाभाविक गति का विषय नहीं है (अर्थात्‌ मनुष्य अपनी स्वाभाविक शक्ति से इस स्थान तक नहीं पहुँच सकता है) । तपस्विनी:-- जैसा महाशय (आप) कहते हैं (वह ठीक है) । अप्सरा (मेनका) से सम्बन्ध होने के कारण इस (बालक) की माँ ने देवताओं के पिता (कश्यप) के आश्रम में (इसको) जन्म दिया है । राजा:-- (एक ओर मुख कर) ओह, यह दूसरी आशाजनक (बात) है । (प्रकट रूप में) अच्छा, आदरणीय (इस बालक की माता) किस राजर्षि की पत्नी हैं ? तपस्विनी:-- (अपनी) धर्मपत्नी का परित्याग करने वाले उस (व्यक्ति) का नाम लेने को कौन सोचेगा (अर्थात्‌ उसका नाम कौन लेगा) ? राजा:-- (अपने मन में) वस्तुतः यह कथा तो मुझे ही लक्ष्य बना रही है । तो इस बालक की माता का नाम पूछता हूँ । अथवा दूसरे की स्त्री के प्रति (यह) व्यवहार (पृपुछताछ) अनुचित है । (मिट्टी का मोर हाथ में ली हुई प्रवेश कर) तपस्विनी:-- सर्वदमन, पक्षी (शकुन्त) का सौंदर्य देखो । बालक:-- (इधर-उधर दृष्टि डालता हुआ) कहाँ है मेरी माँ ? दोनों:-- नाम की समानता के कारण मातृभक्त (यह बालक) ठगा गया (अर्थात्‌ धोखे में आ गया) । दूसरी:-- बेटा इस मिट्टी के मोर की रमणीयता को देखो, (मेरे द्वारा) तुम कहे गये हो (अर्थात्‌ मैने तुमसे यह कहा कि इस मिट्टी के मोर का सौंदर्य देखो) । राजा:-- (अपने मन में) क्या शकुन्तला इसकी माता का नाम है ? किन्तु नामों में समानता भी होती है । ठेसा न हो कि मृगतृष्णा की भांति (शकुन्तला) के नाम का प्रसङ्ग मेरे दुःख के लिये कारण हो जाए । बालक:-- माँ यह सुन्दर मोर मुझे अच्छा लग रहा है । (खिलौना ले लेता है) । पहली:-- (देखकर, घबराहट के साथ) हाय, रक्षाकरण्डक रक्षासूत्र यन्त्र इसकी कलाई में नहीं दिखलायी पड़ रहा है । राजा:-- डरें नहीं । इसका यह रक्षाकरण्डक (रक्षासूत्र, रक्षायन्त्र) सिंह के बच्चे की रगड़ से यहाँ गिर गया है । (उठाना चाहता है) । दोनों:-- इसे मत उठाइए (छुएँ) । क्या इन्होने (इस रक्षासूत्र को) ले लिया (उठा लिया) ? (छाती पर हाथ रखे हुई दोनों एक दूसरे को देखने लगती हैं) । राजा:-- किसलिये (आप लोगों द्वारा इस रक्षा-सूत्र को उठाने से) मैं रोका गया हूँ ? पहली:-- महाराज, सुनिये । यह अपराजिता नाम की ओषधि भगवान्‌ कश्यप के द्वारा इस (बालक) के जातकर्म (संस्कार) के समय दी गयी थी । भूमि पर गिरी हुई इस (ओषधि) को माता, पिता और स्वयं को छोडकर अन्य कोई नहीं उठाता है । राजा:-- यदि (अन्य कोई इसको) उठा लेता है (तो) ? पहली:-- तो उसको सर्प होकर डंस लेती (काट लेती) है । राजा:-- कभी आप दोनों के द्वारा इस (ओषधि) का (साँप के रूप में) बदलना (विक्रिय) होना देखा गया है ? दोनो:-- अनेक बार । राजा:-- (प्रसन्नतापूर्वक, अपने मन में) मैं अपने पूर्ण हुये मनोरथ का अभिनन्दन क्यों न करू । (बालक को छाती से लगा लेता है) दूसरी:-- हे सुव्रता, आओ । इस वृत्तान्त को नियम में लगी हुई शकुन्तला से कह दें । (दोनो निकल जाती हैं) बालक:-- मुझको छोड़ो । मैं तो माँ के पास जाउंगा । राजा:-- बेटे, मेरे साथ ही तुम माँ का अभिनन्दन करोगे । बालक:-- मेरे पिता तो दुष्यन्त हैं । तुम नहीं । राजा:-- (मुस्कराकर) यह विवाद ही (मुझको) विश्वास दिला रहा है (कि तू मेरा पुत्र है) । (तत्पश्चात्‌ एक चोटी को धारण करने वाली शकुन्तला प्रवेश करती है) । शकुन्तला:-- (सर्प के रूप में) बदलने (विकार-परिवर्तन) के समय भी सर्वदमन की औषधि को अपनी स्वाभाविक दशा में ही रहने (अर्थात्‌ सर्प के रूप में न बदलने) (के समाचार) को सुनकर (भी) मुझे अपने भाग्य पर आशा नहीं थी । अथवा जैसा कि सानुमती के द्वारा कहा गया था, उस प्रकार यह सम्भव भी है (कि पतिदेव मुझे खोजते हुये यहां आये हो) । राजा:-- (शकुन्तला को देखकर) अरे, ये वही शकुन्तला है जो यह जो अत्यन्त मलिन वस्त्रों को पहनी हुई, नियम-पालन के कारण कृश (दुर्बल) मुखवाली, एक चोटी (वेणी) को धारण की हुई पवित्र आचरण वाली (ये शकुन्तला) अत्यन्त निर्दय मेरे (इतने) लम्बे (दीर्घकालिक) विरह-व्रत को धारण कर रही है ।
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