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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 27
अदितिः सम्भावनीयानुभावाऽस्याकृतिः । मातलिः- आयुष्मान्‌, एतौ पुत्रप्रीतिपिशुनेन चक्षुषा दिवौकसां पितरावा युष्मन्तमवलोकयतः । तावुपसर्प । राजा-- मातले, प्राहुद्रदिशधा स्थितस्य मुनयो यत्तेजसः कारणं भंतरिं भुवनत्रयस्य सुषुवे यद्यज्ञभागेश्वरम्‌ । यस्मिन्नात्मभवः परोऽपि पुरुषश्चक्रे भवायास्पदं हन्द दश्चमरीचिसम्भवमिदं तत्स्रष्टुरेकान्तरम्‌ ।।
अदिति:-- इनकी आकृति (ही) प्रभाव का अनुमान कराने योग्य है (अर्थात्‌ इनकी आकृति से ही इनके प्रभाव का अनुमान किया जा सकता है) । मातलि:-- चिरंजीवी, ये देवताओं के माता-पिता पुत्रप्रेम-सूचक (वात्सल्य प्रेम से युक्त) नत्रो से आप को देख रहे हैं । उनके समीप चलिये । राजा:-- मातलि ! मुनि लोग जिस (जोड़े) को बारह रूपों मे स्थित (विद्यमान) तेज (सूर्य) का कारण (जनक) कहते हैं, जिस (जोड़े) ने तीनों लोकों के पालक (रक्षक) और यशभाग के अधिकारी देवताओं के स्वामी (इन्द्र) को जन्म दिया है, जिस (जोड़े) में स्वयम्भूः परम पुरुष (विष्णु) ने भी (वामनावतार के रूप में) जन्म लेने के लिये आश्रय (स्थान) बनाया है, दक्ष और मरीचि से उत्पन्न तथा ब्रह्मा से एक पीढ़ी का व्यवधान (अन्तर) वाला (जगद्विदित) यह वही (अदिति और कश्यप का) जोड़ा है।
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