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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 4
राजा--अत्र खलु शतक्रतोरेव महिमा स्तुत्यः । सिध्यन्ति कर्मसु महत्स्वपि यन्नियोज्या सम्भावनागुणमवेहि तमीश्वराणाम्‌ । किं वाऽभविष्यदरुणस्तमसां विभेत्ता । त्तं चेत्‌ सहस्रकिरणो धुरि नाकरिष्यत्‌ ।।
राजा:-- यह (इस विषय में) तो इन्द्र की महत्ता प्रशंसनीय है । महान्‌ (बड़े-बड़े) भी कार्यो में नियुक्त किये गये (सेवक) जो सफल हो जाते हैं, उसे स्वामियों के गौरव का गुण (ही) समझना चाहिये । क्या (सूर्य का सारथि) अरुण अन्धकार का विनाशक हो पाता (अर्थात्‌ नहीं हो पाता) यदि सूर्य उस (अरुण) को (अपने रथ के) धुरा में (अग्रभाग में) न किये होते ।
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