राजा:--
यह (इस विषय में) तो इन्द्र की महत्ता प्रशंसनीय है । महान् (बड़े-बड़े) भी कार्यो में नियुक्त किये गये (सेवक) जो सफल हो जाते हैं, उसे स्वामियों के गौरव का गुण (ही) समझना चाहिये । क्या (सूर्य का सारथि) अरुण अन्धकार का विनाशक हो पाता (अर्थात् नहीं हो पाता) यदि सूर्य उस (अरुण) को (अपने रथ के) धुरा में (अग्रभाग में) न किये होते ।
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