तपस्विनी:--
अच्छा, यह मुझे (कुछ) नहीं गिन रहा (समझ रहा) है । (अगल बगल देखकर) यहाँ ऋषि-कुमारों में कौन (उपस्थित) है ? (राजा को देखकर) हे महाशय, यहाँ आइये । जिसके हाथ की पकड़ (हस्तग्रहण) छुड़ाना बड़ा कठिन (दुर्मोन्च) है ऐसे बालक के द्वारा बालक्रीड़ा के साथ पीड़ित (परेशान) किये जाते हुये इस सिंहशावक को छुड़ा दीजिये ।
राजा:--
(समीप जाकर मुस्कराते हुये) अरे महर्षिपुत्र, इस प्रकार आश्रम के विपरीत (विरुद्ध) आचरण (व्यवहार) करने वाले तुम, जन्म से ही प्राणियों (जीवो) को आश्रय देने के कारण सुखप्रद भी (अहिंसा आदि) संयम, काले साँप के बच्चे के द्वारा चन्दन के वृक्ष की भाँति क्यों दूषित (कलंकित) कर रहे हो ?
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