मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 18
तापसी-- भवतु । न मामयं गणयति । (पार्चमवलोक्य) कोऽत्र ऋषिकुमाराणाम्‌ ? (राजानमवलोक्य) भद्रमुख, एहि तावत्‌ । मोचयानेन दुर्मोचहस्तग्रहेण डिम्भलीलया बाध्यमानं बालमृगेन्द्रम्‌ । राजा--(उपगम्य । सस्मितम्‌) अयि भो महर्षिपुत्र, एवमाश्रमविरुद्धवृत्तिना सयमः किमिति जन्मतस्त्वया । सत्वसश्रयसुखोऽपि दूष्यते कृष्णसर्पशिशुनेव चन्दनः ।।
तपस्विनी:-- अच्छा, यह मुझे (कुछ) नहीं गिन रहा (समझ रहा) है । (अगल बगल देखकर) यहाँ ऋषि-कुमारों में कौन (उपस्थित) है ? (राजा को देखकर) हे महाशय, यहाँ आइये । जिसके हाथ की पकड़ (हस्तग्रहण) छुड़ाना बड़ा कठिन (दुर्मोन्च) है ऐसे बालक के द्वारा बालक्रीड़ा के साथ पीड़ित (परेशान) किये जाते हुये इस सिंहशावक को छुड़ा दीजिये । राजा:-- (समीप जाकर मुस्कराते हुये) अरे महर्षिपुत्र, इस प्रकार आश्रम के विपरीत (विरुद्ध) आचरण (व्यवहार) करने वाले तुम, जन्म से ही प्राणियों (जीवो) को आश्रय देने के कारण सुखप्रद भी (अहिंसा आदि) संयम, काले साँप के बच्चे के द्वारा चन्दन के वृक्ष की भाँति क्यों दूषित (कलंकित) कर रहे हो ?
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें