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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 19
तापसी-- भद्रमुख, न खल्वयमृषिकुमारः । राजा- आकारसदृशं चेष्टितमेवास्य कथयति । स्थानप्रत्ययात्तु वयमेवतर्किणः । अनेन कस्यापि कुलाङ्करेण स्पृष्टस्य गात्रेषु सुखं ममेवम्‌ । कां निर्वृतिं चेतसि तस्य कुर्याद्‌ यस्मायमङ्कात्‌ कृतिनः प्ररूढः ।।
तपस्विनी:-- महाशय, यह ऋषि पुत्र नहीं है । राजा:-- आकृति के अनुरूप (सदृश) इसका व्यवहार ही बतला रहा है (कि यह ऋषि पुत्र नहीं) । परन्तु (इस) स्थान के विश्वास के कारण हमने सोचा था । (तपस्विनी की प्रार्थना के अनुसार कार्य करते हुये अर्थात्‌ बालक से सिंह-शावक को छुड़ाते हुये बालक के स्पर्श को प्राप्तकर । (अपने मन में) किसी भी वंश के अङ्करस्वरूप इस (बालक) के द्वारा स्पर्श किये गये मेरे अंगों को (यदि) ऐसा सुख (हो रहा है) (तो) जिस भाग्यशाली की गोद से यह उत्पन्न हुआ है, उसके हृदय मे कितना सुख (आनन्द) उत्पन्न करता होगा (देता होगा) । अर्थात्‌ उसके आनन्द की तो सीमा ही नहीं होगी ।
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