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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 34
राजा-- भगवता कृतसंस्कारे सर्वमस्मिन्‌ वयमाशास्महे । अदितिः - भगवन् अस्या दुहितृमनोरथसम्पत्तेः कण्वोऽपि तायच्छ्रतविस्तारः क्रियताम् । दुहितृवत्सला पेनकेहैवोपचरन्ती तिष्ठति । शकुन्तला - (आत्मगतम्) मनोरथः खलु में भणितो भगवत्या । मारीचः - तपः प्रभावात् प्रत्यक्षं सर्वमेव तत्रभवतः । राजा-अतः खलु मम नातिक्क्रुद्धो मुनिः । मारीचः - तथाप्यसौ प्रियमस्माभिः श्रावयितव्यः । कः कोऽत्र भोः ? (प्रविष्य ) शिष्यः - भगवन् अयमस्मि । मारीचः गालव, इदानीमेव विहायसा गत्वा मम वचनात्, तत्रभवते कण्वाय प्रियमावेदय यथा-पुत्रवती शकुन्तला तच्छापनिवृत्ती स्मृतिमता दुष्यन्तेन प्रतिगृहीतेति । शिष्यः - यदाज्ञापयति भगवान् । (इति निष्क्रान्तः) । मारीचः - वत्स, त्वमपि स्वापत्यदारसहितः सख्युराखण्डलस्य रथामारुह्य ते राजधानीं प्रतिष्ठस्व । रााजा-यदाज्ञापयति भगवान् । मारीचः अपि च-- प्राज्यवृष्टिः विडौजाः तव भवतु त्वमपि विततयज्ञो युगशतपरिवर्तानेवमन्योन्यकृत्यै प्रजासु प्रीणयस्व । नंयतमु भयलो कानु महश्लाघनीयैः ।।
राजा:-- आप के द्वारा किये गये संस्कार से सम्पन्न इस (बालक) में हम सब कुछ आशा करते हैं । अदिति:-- भगवन्, पुत्री (शकुन्तला) की (पूर्ण हुयी) इस अभिलाषा (के समाचार) को विस्तारपूर्वक कण्व को भी बता देना चाहिये। पुत्री को अत्यधिक स्नेह करने वाली मेनका तो (हम लोगों की) सेवा करती हुयी यहाँ ही हैं। शकुन्तला:-- (अपने मन में) भगवती (अदिति) के द्वारा वस्तुतः मेरे मन की बात कही गयी है (भगवती अदिति ने मेरे मन की बात कही है)। कश्यप:-- तपस्या के प्रभाव से सभी बातें महात्मा (कण्व) के प्रत्यक्ष ही हैं (अर्थात् तपस्या के प्रभाव से कण्व को सब कुछ ज्ञात है)। राजा:-- इसीलिये ये (सब कुछ जान के कारण ही कण्व) मुनि मेरे ऊपर अधिक क्रुद्ध नहीं (हुये)। कश्यप:-- तो भी यह शुभ (प्रिय) समाचार हम लोगों के द्वारा (कण्व को) सुना (बता) दिया जाना चाहिये। अरे कौन-कौन है यहाँ ? शिष्य:-- (प्रवेश करके) भगवन्, यह मैं हूँ। कश्यप:-- गालव ! (तुम) अभी आकाश-मार्ग से जाकर मेरे आदेशानुसार महात्मा (कण्व) से (यह) शुभ (प्रिय) समाचार कहना कि पुत्र-सहित शकुन्तला को (दुर्वासा के द्वारा दिये गये) शाप से निवृत्त होने पर स्मृतियुक्त दुष्यन्त के द्वारा (अङ्गीकार) कर ली गयी। शिष्य:-- पूज्य आप जैसी आज्ञा देते हैं। (निकल जाता है) कश्यप:-- बेटा, तुम भी अपने पुत्र और पत्नी के साथ (अपने) मित्र इन्द्र के रथ पर चढ़कर अपनी राजधानी (हस्तिनापुर) को प्रस्थान करो । राजा:-- पूज्य, आप जो आदेश (आशा) देते हैं। कश्यप:-- इन्द्र तुम्हारी प्रजाओं के लिये पर्याप्त (अर्थात् पर्याप्त जल बरसावे) । तुम भी यशों का विस्तार करके इन्द्र को प्रसन करो। इस प्रकार (स्वर्ग तथा मर्त्य) दोनों लोकों के उपकार (अनुमह) के कारण प्रशंसनीय कार्यों से तुम दोनों सैकड़ों युगों को बिताओ।
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