राजा:--
भगवन् , मैं यथाशक्ति (लोगों के) कल्याण के लिये प्रयत्न करूंगा ।
कश्यप:--
बेटा, मैं तुम्हारा ओर क्या प्रिय उपकार करूं ?
राजा:---
क्या इससे भी अधिक और प्रिय कार्य है ? यदि भगवान् (आप) कुछ और प्रिय करना चाहते हैं तो यह हो जाय । (भरतवाक्य) राजा प्रजा के हित (कल्याण) के लिये प्रयत्नशील हो । ज्ञान के कारण वरिष्ठ (महान्) लोगों (विभूतियो) की वाणी (कृति) गौरव (प्रतिष्ठा) को प्राप्त करे । सर्वशक्तिमान् स्वयम्भू शिव मेरे भी पुनर्जन्म को नष्ट करें (अर्थात् पुनर्जन्म से मुक्त करें) ।
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