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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 35
राजा-- भगवन्‌ , यथाशक्ति श्रेयसे यतिष्ये । मारीचः- वत्स, किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि ? राजा--अतः परमपि प्रियमस्ति ? यदीह भगवान्‌ प्रियं कर्तुमिच्छति तर्हीदमस्तु (भरतवाक्यम्‌)-- प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिवः सरस्वती श्रुतमहतां महीयताम्‌ । ममापि च क्षपयतु नीललोहितः पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः ।।
राजा:-- भगवन्‌ , मैं यथाशक्ति (लोगों के) कल्याण के लिये प्रयत्न करूंगा । कश्यप:-- बेटा, मैं तुम्हारा ओर क्या प्रिय उपकार करूं ? राजा:--- क्या इससे भी अधिक और प्रिय कार्य है ? यदि भगवान्‌ (आप) कुछ और प्रिय करना चाहते हैं तो यह हो जाय । (भरतवाक्य) राजा प्रजा के हित (कल्याण) के लिये प्रयत्नशील हो । ज्ञान के कारण वरिष्ठ (महान्‌) लोगों (विभूतियो) की वाणी (कृति) गौरव (प्रतिष्ठा) को प्राप्त करे । सर्वशक्तिमान्‌ स्वयम्भू शिव मेरे भी पुनर्जन्म को नष्ट करें (अर्थात्‌ पुनर्जन्म से मुक्त करें) ।
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