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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 20
तापसी- (उभौ निर्वर्ण्य) आश्चर्यमाश्चर्यम्‌ । राजा- आर्ये, किमिव ? तापसी-- अस्य बालकस्य तेऽपि संवादिन्याकृतिरिति विस्मिताऽस्मि । अपरिचितस्यापि तेऽप्रतिलोमः संवृत्त इति । राजा-- (बालकमुपलालयन्‌) नं चेन्मुनिकुमारोऽयम्‌ , अथ कोऽस्य व्यपदेशः ? तापसी--पुरुवंश । राजा- (आत्मगतम्‌) कथमेकान्वयो मम ? अतः खलु मदनुकारिणमेनमत्र भवती मन्यते । अस्त्येतत्‌ पौरवाणामन्त्यं कुलव्रतम्‌ । भवनेषु रसाधिकेषु पूर्वं क्षितिरक्षार्थमुशान्ति ये निवासम्‌ । नियतैकयतिव्रतानि पश्चात्‌ तरुमूलानि गृहीभवन्ति तेषाम्‌ ।।
तपस्विनी:-- (दोनों को देखकर) आश्चर्य है, आश्चर्य है । राजा:-- आर्ये, (आश्चर्य) क्यों ? तपस्विनी:-- इस बालक की और आप की मिलती हुई आकृति है अर्थात्‌ दोनों की आकृति परस्पर मिल रही है । इसलिये मैं आश्चर्यचकित हूँ । अपरिचित होते हुये भी (यह) आप के अनुकूल हो गया है (अर्थात्‌ अपरिचित होते हुये भी आप के कहने से यह शान्त हो गया है) । राजा:-- (बालक को दुलारते हुये) यदि यह मुनि-कुमार नहीं है, तो इसका वंश (व्यपदेश) क्या है ? राजा:-- (अपने मन में) क्या मेरे समान वंश वाला (एकान्वय) है (अर्थात्‌ क्या मेरा और इसका वंश एक ही है) ? इसलिये आदरणीय (आप) (तपस्विनी) इस (बालक को) मेरे समान (अनुरूप) मान रही हैं । यह पुरुवंशियों का अन्तिम कुलव्रत भी है । जो पहले (युवावस्था में) पृथ्वी की रक्षा के लिये भोगों से परिपूर्ण भवनों में निवास चाहते हैं (निवास करते हैं), बाद में (अर्थात्‌ वृद्धावस्था में) जहां तपस्विजन नियमित रूप से जीवन व्यतीत करते हैं ऐसी वृक्षों की जड़ें उनका घर हो जाती हैं ।
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