दूसरी:--
हे सुव्रता, कहने मात्र से यह नहीं रोका जा सकता । तुम जाओ मेरी कुटिया में रंगों से रगा हुआ ऋषिकुमार मार्कण्डेय का मिट्टी का मोर रखा हुआ है । उसे इसके लिए लाओ ।
पहली:--
(जैसा तुम कहती हो) वैसा (ही करती हूँ) । (निकल जाती है) ।
बालक:--
तब तक इसी से खेलता हूँ । (तापसी को देखकर हँसता है) ।
राजा:--
वस्तुतः इस हठी (नटखट) बालक (को प्यार करने) के लिये मैं ललक रहा हूँ । अकारण (अर्थात् बिना किसी कारण के) हंसी से जिनका दाँतरूपी अंकुर कुछ-कुछ दिखायी पड़ रहा है, अस्पष्ट वर्णो के (उच्चारण के) कारण (अर्थात् तोतली बोली से) जिनका बोलना रमणीय (प्रिय) लग रहा है, जो गोद में रहने (चढ़ने) के लिये लालायित रहते हैं, ऐसे पुत्रों को (गोद में) लिये हुये भाग्यशाली लोग (ही) उन (बच्चों) के (शरीर के) अंगों (में लगी हुई) धूल से मलिन (धूसरित) होते हैं ।
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