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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 17
द्वितीया-- सुव्रते, न शक्य एष वाचामात्रेण विरमयितुम्‌ । गच्छ त्वम्‌ । मदीये उटजे मार्कण्डेयस्यर्षिकुमारस्य वर्णचित्रितो मृत्तिकामयुरस्तिष्ठति तमस्योपहर । प्रथमा- तथा (तह ।) (इति निक्क्रान्ता) । बालः- अनेनैव तावत्‌ क्रीडिष्यामि । (इमिणा एव्व कीलिस्सं ।) (इति तापसीं विलोक्य हसति) । राजा- स्प्हयामि खलु दुर्ललितायास्मै । आलक्ष्यदन्तमुकुलाननिमित्तहासैरव्यक्तवर्णरमणीयवचःप्रवृत्तीन्‌ । ` अङ्काश्रयप्रणयिनस्तनयान्‌ वहन्तो धन्यास्तदङ्गरजसा मलिनीभवन्ति ।।
दूसरी:-- हे सुव्रता, कहने मात्र से यह नहीं रोका जा सकता । तुम जाओ मेरी कुटिया में रंगों से रगा हुआ ऋषिकुमार मार्कण्डेय का मिट्टी का मोर रखा हुआ है । उसे इसके लिए लाओ । पहली:-- (जैसा तुम कहती हो) वैसा (ही करती हूँ) । (निकल जाती है) । बालक:-- तब तक इसी से खेलता हूँ । (तापसी को देखकर हँसता है) । राजा:-- वस्तुतः इस हठी (नटखट) बालक (को प्यार करने) के लिये मैं ललक रहा हूँ । अकारण (अर्थात्‌ बिना किसी कारण के) हंसी से जिनका दाँतरूपी अंकुर कुछ-कुछ दिखायी पड़ रहा है, अस्पष्ट वर्णो के (उच्चारण के) कारण (अर्थात्‌ तोतली बोली से) जिनका बोलना रमणीय (प्रिय) लग रहा है, जो गोद में रहने (चढ़ने) के लिये लालायित रहते हैं, ऐसे पुत्रों को (गोद में) लिये हुये भाग्यशाली लोग (ही) उन (बच्चों) के (शरीर के) अंगों (में लगी हुई) धूल से मलिन (धूसरित) होते हैं ।
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