राजा-- मातले, असुरसम्प्रहारोत्सुकेन पूरवदयुर्दिवमधिरोहता मया न लक्षितः स्वर्गमार्गः । कतमस्मिन् मरुतां पथि वतमिहे ?
मातलिः--त्रिस्रोतसं वहति यो गगनप्रतिष्ठां ज्योतीषि वर्तयति च प्रविभक्तरष्टमिः। तस्य॒द्वितीयहरिविक्रमनिस्तमस्कं वायोरिमं परिवहस्य वदन्ति मार्गम् ।।
राजा:--
हे मातलि, असुरों पर आक्रमण करने के लिये उत्कण्ठित मैने पहले दिन स्वर्ग की ओर चढ़ते समय, स्वर्ग का मार्ग (ध्यानपूर्वक) नहीं देखा था । (बताइये) हम लोग वायु के किस मार्ग पर चल रहे हैं ?
मातलिः--
जो (परिवह नामक वायु) आकाश में प्रतिष्ठित (स्थित) आकाश गंगा को धारण करता है और (जो वायु रूप) किरणों को फैलाकर ग्रह-नक्षत्रों (सप्तर्षि-मण्डल) को (ठीक ठीक) चलाता (घुमाता) है । (वामन रूप धारण करने वाले) विष्णु के द्वितीय चरण-विन्यास से अन्धकार-रहित (पवित्र) इसे "परिवह" नामक वायु का मार्ग कहते हैं ।
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