मातलि:--
(आप ने) ठीक देखा । (अत्यधिक आदरपूर्वक देखकर) अहो, यह पृथ्वी (कितनी) विशाल और रमणीय (चित्ताकर्षक) है ।
राजा:--
मातलि, यह पूर्व और पश्चिम समुद्र में प्रविष्ट, सुवर्ण के रस को बहाने वाला सायंकालीन बादलों की अर्गला (परिधि) के समान यह कौन पर्वत दिखायी पड़ रहा है ?
मातलि:--
चिरञ्जीविन् , यह तपस्या का सिद्धि-क्षेत्र किन्नरों का हेमकूट नामक पर्वत है । देखिये ब्रह्मा के पुत्र मरीचि से जो प्रजापति (कश्यप) उत्पन्न हुये हैं, देवताओं और राक्षसों के पिता वे (प्रजापति) (अपनी) पत्नी के साथ यहाँ तपस्या कर रहे हैं ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।