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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 9
मातलिः- साधुं दृष्टम्‌ । (संबहुमानमंवलोक्यं) अहो; उदाररमणीया पृथ्वी । राजा-- मातले, कतमोऽय पूर्वापरसमुद्रावगाढः कनकरसनिस्यन्दी सान्ध्य इवं मेधपरिधः सानुमानवलोक्यते ? मातलिः- आयुष्मन्‌ , एष खलु हेमकूटो नाम किपुरुषपर्वतस्तपःससिद्िक्षत्रम्‌ । पश्य-- स्वायम्भुवान्मरीचेर्यः प्रबभूव प्रजापतिः । सुरासुरगुरुः सोऽत्र सपत्नीकस्तपस्यति ।।
मातलि:-- (आप ने) ठीक देखा । (अत्यधिक आदरपूर्वक देखकर) अहो, यह पृथ्वी (कितनी) विशाल और रमणीय (चित्ताकर्षक) है । राजा:-- मातलि, यह पूर्व और पश्चिम समुद्र में प्रविष्ट, सुवर्ण के रस को बहाने वाला सायंकालीन बादलों की अर्गला (परिधि) के समान यह कौन पर्वत दिखायी पड़ रहा है ? मातलि:-- चिरञ्जीविन्‌ , यह तपस्या का सिद्धि-क्षेत्र किन्नरों का हेमकूट नामक पर्वत है । देखिये ब्रह्मा के पुत्र मरीचि से जो प्रजापति (कश्यप) उत्पन्न हुये हैं, देवताओं और राक्षसों के पिता वे (प्रजापति) (अपनी) पत्नी के साथ यहाँ तपस्या कर रहे हैं ।
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