राजा:--
जैसा पूज्य आप ने कहा (वह ठीक ही है)।
कश्यप:--
बेटा, क्या तुमने हमारे द्वारा विधिपूर्वक किये गये जातकर्म (संस्कार) वाले शकुन्तला से उत्पन्न पुत्र का अभिनन्दन कर लिया है।
राजा:--
भगवन्, यहाँ (इसी पर) मेरे वंश की प्रतिष्ठा (आश्रित) है। (बालक को हाथ से पकड़ता है)।
कश्यप:--
आप इसको उसी प्रकार होने वाला चक्रवर्ती (सम्राट) समझें। देखिए अद्वितीय महारथी यह उद्घात रहित (अस्खलित) होने से शान्त गति वाले रथ से सागरों को पार कर भविष्य में सात द्वीपों वाली पृथ्वी को जीतेगा। यहाँ (आश्रम में) प्राणियों का बलपूर्वक दमन करने (वश में करने) के कारण (इसका नाम) 'सर्वदमन' है। बाद (भविष्य) में लोक (संसार) का भरण-पोषण करने के कारण "भरत" इस नाम को प्राप्त करेगा। अर्थात् "भरत" इस नाम से विख्यात होगा।
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