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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 33
राजा-यथाह भगवान् । मारीचः-- वत्स, कच्चिदभिनन्दितस्त्वया विधिवदस्माभिरनुष्ठितजातकर्मा पुत्र एष शाकुन्तलेयः ? राजा-भगवन्, अत्रं खलु मे वंशप्रतिष्ठा। (इति बालं हस्तेन गृह्मति) । मारीचः तथाभाविनयेनं चक्रवर्तिनमवगच्छतु भवान् । पश्य- रथेनानुद्घातस्तिमितगतिना पुरा सप्तद्वीपां जयति वसुधामप्रतिरथः । इहायं सत्त्वानां प्रसभदमनात् सर्वदमनः पुनर्यास्यत्याख्यां भरत इति लोकस्य भरणात् ।।
राजा:-- जैसा पूज्य आप ने कहा (वह ठीक ही है)। कश्यप:-- बेटा, क्या तुमने हमारे द्वारा विधिपूर्वक किये गये जातकर्म (संस्कार) वाले शकुन्तला से उत्पन्न पुत्र का अभिनन्दन कर लिया है। राजा:-- भगवन्, यहाँ (इसी पर) मेरे वंश की प्रतिष्ठा (आश्रित) है। (बालक को हाथ से पकड़ता है)। कश्यप:-- आप इसको उसी प्रकार होने वाला चक्रवर्ती (सम्राट) समझें। देखिए अद्वितीय महारथी यह उ‌द्घात रहित (अस्खलित) होने से शान्त गति वाले रथ से सागरों को पार कर भविष्य में सात द्वीपों वाली पृथ्वी को जीतेगा। यहाँ (आश्रम में) प्राणियों का बलपूर्वक दमन करने (वश में करने) के कारण (इसका नाम) 'सर्वदमन' है। बाद (भविष्य) में लोक (संसार) का भरण-पोषण करने के कारण "भरत" इस नाम को प्राप्त करेगा। अर्थात् "भरत" इस नाम से विख्यात होगा।
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