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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 30
राजा-- भगवन्‌ , प्रागभिप्रेतसिद्धिः । पश्चाद्‌ दर्शनम्‌ । अतोऽपूर्वः खलु वोऽनुग्रहः । कुतः-- उदेति पूर्वं कुसुमं ततः फलं घनोदयः प्राक्‌ तदनतरं पयः । निमित्तनैमित्तिकयोरयं क्रमस्तव प्रसादस्य पुरस्तु सम्पदः ।।
राजा:-- भगवन्‌ , पहले अभीष्ट की प्राप्ति (सिद्धि) हो गयी । तत्पश्चात्‌ (आपका) दर्शन हुआ । अतः यह आप की कृपा अनुपम (अपूर्व) है । क्योकि पहले फूल निकलता है, तत्पश्चात्‌ फल (बनता है) । पहले बादलों का उद्धव (होता है) (अर्थात्‌ पहले बादल घिरते हैं), उसके बाद जल (बरसता है) । कारण ओर कार्य का यही क्रम है । किन्तु आप की कृपा के आगे-आगे (ही) सम्पत्तियां (चलती हैं) ।
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