शकुन्तला:--
(पश्चताप के कारण मलिन राजा को देखकर) ये तो आर्यपुत्र के सदृश नहीं है । तो यह कौन इस समय मङ्गल रक्षाकरण्डक को धारण करने वाले मेरे पुत्र को (अपने) शरीर के स्पर्श से दूषित कर रहा है ।
बालक:--
(माता के पास जाकर) माँ, यह कोई (अपरिचित) पुरुष "पुत्र" ऐसा कहकर मेरा आलिङ्गन कर रहा है ।
राजा:--
प्रिये, तुम्हारे प्रति की गयी मेरी क्रूरता भी (मेरे) अनुकूल परिणाम वाली हो गयी है, क्योकि अब मैं अपने को तुम्हारे द्वारा पहचाना हुआ देख रहा हूँ ।
शकुन्तला:--
(अपने मन में) हृदय, धैर्य रखो, धैर्य रखो। भाग्य ने द्वेषभाव छोड़कर मेरे ऊपर कृपा की है। ये आर्यपुत्र (पतिदेव) ही हैं।
राजा:--
हे सुमुखी (सुन्दरी), सौभाग्य से स्मरण हो जाने के कारण अज्ञान रूपी अन्धकार से विमुक्त मेरे समक्ष तुम (उसी प्रकार) उपस्थित हो गयी हो, (जिस प्रकार) ग्रहण के समाप्त होने पर (चन्द्रमा की पत्नी) रोहिणी चन्द्रमा के संयोग (मिलन) को प्राप्त कर लेती है (अर्थात् चन्द्रमा से मिल जाती है)।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।