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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 22
शकुन्तला-(पश्चात्तापाववर्ण राजानं दृष्टवा) न खल्वार्यपुत्र इव । ततः क एष इदानीं कृतरक्षामङ्गलं दारकं मे गात्रसंसर्गेण दूषयति । बाल:-- (मातरमुपेत्य) मातः? एष कोऽपि पुरूषो मां पुत्र इत्यालिङ्गति । राजा-प्रिये, क्रौर्यमपि मे त्वयि प्रयुक्तमनुकूलपरिणामं संवृत्तम्‌ , यदहमिदानींल्या प्रत्यभिज्ञातमात्मानं पश्यामि । शकुन्तला - (आत्मगतम् हृदय, समाश्वसिहि समाश्वसिहि । परित्यक्तमत्सरेणा नुकम्पितास्मि दैवेन । आर्यपुत्रः खल्वेषः । राजा-प्रिये, स्मृतिभिन्नमोहतमसो दिष्ट्या प्रमुखे स्वितासि मे सुमुखि । उपरागान्ते शशिनः समुपगता रोहिणी योगम् ।।
शकुन्तला:-- (पश्चताप के कारण मलिन राजा को देखकर) ये तो आर्यपुत्र के सदृश नहीं है । तो यह कौन इस समय मङ्गल रक्षाकरण्डक को धारण करने वाले मेरे पुत्र को (अपने) शरीर के स्पर्श से दूषित कर रहा है । बालक:-- (माता के पास जाकर) माँ, यह कोई (अपरिचित) पुरुष "पुत्र" ऐसा कहकर मेरा आलिङ्गन कर रहा है । राजा:-- प्रिये, तुम्हारे प्रति की गयी मेरी क्रूरता भी (मेरे) अनुकूल परिणाम वाली हो गयी है, क्योकि अब मैं अपने को तुम्हारे द्वारा पहचाना हुआ देख रहा हूँ । शकुन्तला:-- (अपने मन में) हृदय, धैर्य रखो, धैर्य रखो। भाग्य ने द्वेषभाव छोड़कर मेरे ऊपर कृपा की है। ये आर्यपुत्र (पतिदेव) ही हैं। राजा:-- हे सुमुखी (सुन्दरी), सौभाग्य से स्मरण हो जाने के कारण अज्ञान रूपी अन्धकार से विमुक्त मेरे समक्ष तुम (उसी प्रकार) उपस्थित हो गयी हो, (जिस प्रकार) ग्रहण के समाप्त होने पर (चन्द्रमा की पत्नी) रोहिणी चन्द्रमा के संयोग (मिलन) को प्राप्त कर लेती है (अर्थात् चन्द्रमा से मिल जाती है)।
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