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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 23
शकुन्तला--जयतु जयत्वार्यपुत्रः । (जेदु जेदु अज्जउत्तो ।) (इत्यधेक्ति बाष्पकण्ठी विरमति) । राजा- सुन्दरि, बाष्पेण प्रतिषिद्धेऽपि जयशब्दे जितं . मया । यत्ते दष्टमसस्कारपाटलोष्ठपुट मुखम्‌ ।।
शकुन्तला:-- जय हो, आर्यपुत्र की जय हो । (आधा ही कहने पर आंसुओं से गला भर जाने के कारण रुक जाती है)। राजा:-- (गले में) आंसू के कारण जयशब्द के रोक लिये जाने पर भी मैंने (एक प्रकार से) विजय प्राप्त कर ली, क्योकि बिना प्रसाधन (सजावट) के भी लाल ओटों से युक्त तुम्हारा मुख देख लिया ।
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